Wednesday, 18 December 2019

Udaipur and Mount Abu ki yatra उदयपुर, माउंट आबू (राजस्थान) की यात्रा भाग-2(अंतिम)

उदयपुर की यात्रा समाप्त कर हम माउंट आबू की ओर बढ़ चले थे। उदयपुर  से माउंट आबू 160-180 Km है। रास्ता अरावली श्रेणी के हर-भरे पहाड़ियों के बीच से गुजरता है। सड़के अच्छी बनी हुई है। हमारे मित्र ''विक्रम जी" कई बार माउंट आबू जा चुके थे अत: वे हमे माउंट आबू के बारे में बता रहे थे।
चार चौकड़ी 

गाड़ी तेज गति से आगे बढ़ रही थी, हमलोग पल-पल माउंट आबू  की ओर बढ़ रहे थे, मन में राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन को देखने की उत्सुकता भी बढ़ती जा रही थी, लेकिन रास्ते भी कम न थे। ढलती शाम के साथ-साथ बादल भी पहाड़ों को छु कर अठखेलियां कर रहे थे। छोटी-छोटी पहाडियां, हरे-भरे जंगल  के बीच बादलों का आना इतना मोहित कर रह रहा था कि हमे अपनी गाड़ी रोक कर कुछ देर इन्हे निहारने को मजबूर होना पड़ा। विक्रम जी ने एक छोटी सी झोपड़ी के किनारे गाड़ी रोकी। यहां एक स्थानीय लड़का चाय बना रहा था, उसे चार चाय बनाने को बोलकर हमलोग थोड़ी दूर एक बड़े पत्थर पर बैठ कर प्रकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने लगे। कुछ देर में हमारी चाय आ गई। लड़के ने अच्छी चाय बनाई थी चाय पी कर कुछ फोटो लिए और वहां से आगे बढ़ चले।
Roadside View

शाम ढाल रही थी, मौसम भी बदल रहा था लेकिन फिर भी माउंट आबू पहुँचने की जल्दी नहीं थी क्योंकि हमने सुन रखा था कि वहाँ रहने की कोई समस्या नहीं होती है। वहां अनेकों होटल, धर्मशाला आदि है। अब चढ़ाई शुरू हो गई थी जो हमे उतरखण्ड की याद दिला रहा था। बीच-बीच में View Points भी बने हुए थे जहां हमलोग उतरकर फोटो  खीच रहे थे । लगभग 9 बजे हमलोग माउंट आबू पहुँच गए।
ढलती शाम 

यहाँ काफी भीड़-भाड़ थी, लग रहा था कि हमलोग मेले में आ गए है। खैर अब हमे होटल ढूंढना था। बड़ी मुश्किल से गाड़ी पार्क करने की जगह मिली गाड़ी पार्क कर हम होटल ढूंढने लगे। एक-दो होटल में पूछा तो बताया गया कि होटल में कमरे बुक है। हमने सोचा कि शायद थोड़ी दूर आगे बढ्ने पर होटल खाली मिल जाय। लेकिन ये क्या? सारे होटल बुक हो चुके थे। अब हमे बेचैनी होने लगी थी सारे भ्रम टूट चुके थे।   
हमलोग ऑन-लाइन होटल देखने लगे OYO ओर Goibibo पर कुछ होटेलों में कमरे दिख रहे थे। अत: हमलोग  उसकी तरफ दौड़ पड़े। लेकिन ये क्या? यहाँ तो होटल ही नहीं है। कस्टमर सर्विस वालों से बात किया तो वो गोल-मोल घुमाते रहे लेकिन होटल नहीं मिला। थक- हार कर हम एक होटल में पहुँचे जहाँ एक सिंगल कमरा बचा था जो चार हजार में मिल रहा था। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, अत: हमलोग उसी कमरे में रुकने का निर्णय कर लिया। होटल ढूंढने के क्रम में हमलोग मानसिक और शारीरिक रूप से काफी थक चुके थे अत: खाना खा कर जल्दी ही सो गए। 
सुबह जल्दी उठकर तैयार होने लेगे। ठंड काफी अधिक हो चुकी थी। बाहर जाकर देखा तो घना कुहरा लगा था । दो-तीन मीटर से अधिक दूरी तक दिखाई नहीं दे रहा था। अत: हमने थोड़ी देरी से होटल से निकलने का मन बनाया । अब तक हमलोग माउंट आबु में स्थित आकर्षक स्थलों के बारे में बाते करते रहे। 
माउंट आबु राजस्थान का एक मात्र हिल स्टेशन है। यह गुजरात के नजदीक है अत: यहाँ गुजरती लोगों को बहुलता से देखा जा सकता है। यहाँ नक्की झील, दिलवाड़ा का जैन मंदिर, ब्रम्हकुमारी प्रजापति का आश्रम, माउंट आबु शिखर और Bio-diversity Park भी है।
Bio-diversity Park

मौसम का थोड़ा साफ होने पर सड़कों पर हलचल दिखने लगी । हमलोग भी तैयार होकर अपना सामान अपनी गाड़ी में रख लिया। सर्वप्रथम हमलोग झील देखने गए। कुहासे के मध्य झील के किनारे काफी भीड़-भाड़ थी। किनारे स्थित दुकानों पर पर चाय के लिए धक्का-मुक्की कर हमने अपने लिए चाय ले लिया। जुलाई में दिल्ली की गर्मी झेलकर यहाँ जनवरी जैसी ठंडक का आनंद प्राप्त कर रहा था। यधपि कुहरे के कारण  झील की खुबसुरती अधिक नहीं दिखाई पद रही थी लेकिन जुलाई में झील के किनारे चाय के साथ ठंड का मजा भी अपने आप में अदभुद था।

थोड़ी देर झील के किनारे समय व्यतीत करने के बाद हमलोग अपने अगले पड़ाव दिलवाड़ा के जैन मंदिर की ओर बढ़ चले। जैन मंदिर के पास पहुँचने के बाद पता चला कि जैन मंदिर में थोड़ी देर बाद प्रवेश मिलेगा अत: हमलोग जैन मंदिर से थोड़ी दूर स्थित Bio-diversity Park  देखने चले गए। यहाँ प्रति व्यक्ति 150 रु तथा गाड़ी का 250 रु फीस लग रहा था। फीस जमा  कर हम जंगल के अंदर प्रवेश कर गए। थोड़ी दूर चलने के बाद एक स्थान पर पार्किंग बनी थी जहाँ हमलोगों ने अपनी गाड़ी पार्क की और जंगल में ट्रैकिंग का आनंद लेने लगे। 
मौसम बदल रहा था। हल्की-हल्की हवा के साथ पानी की फुहारों ने ठंडक के साथ रूमानी बरसात का भी अहसास कराना आरम्भ कर दिया था। थोड़ी दूर चलने पर एक झील दिखाई दिया जिसके किनारे पर्यटकों के बैठने का स्थान बना हुआ था।
Bio-diversity Park में 

यहाँ अनेक गुजरती परिवार मस्ती कर रहे थे। थोड़ी दूर से कुछ युवाओं की टोली की मस्ती करने की आवाज़े आ रही थी लेकिन धुंध के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। लगातार आ रही आवाजों ने हमारे मन में कौतुहल पैदा कर दिया था अत: हमलोग भी उसी दिशा में चल पड़े। कटीली झड़ियों के बीच से गुजरते हुए हमे सीढ़ियाँ दिखाई दी अत: हमलोग समझ गये कि पास ही कोई ऊंची जगह पर युवा मस्ती कर रहे है। थोड़ा और पास जाने पर एक बड़ा सा चट्टान दिखाई दिखाई दिया जिसके उपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी थी। हम चारों दोस्त इस चट्टान पर चढ़ गए।
Bio-diversity Park में चट्टान के ऊपर आनंद लेते हुए 
चट्टान के चारों तरफ लोहे की रेलिंग लगी थी ताकि आगंतुक सुरक्षित रूप से आनंद उठा सके। यहाँ हवाएं तेज लग रही थी फुहारों ने तो हमे भिगाने का ठेका ही ले रखा था। लेकिन फिर भी यहाँ इतनी शांति थी कि यहाँ से उतरने का मन ही नहीं हो रहा था। समय के अभाव के कारण मन को समझाया और हमलोग अपने अगले पड़ाव माउंट आबू शिखर कि ओर चल दिये।    

दिन की दोपहरी हो चुकी थी लेकिन धुंध अभी भी बना हुआ था। हमारी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। रास्ते में सड़क किनारे चट्टान पर युवा जोड़े मस्ती करते दिख रहे थे। कई स्थानो पर हमने भी गाड़ी रोक कर मस्ती की, फिर आगे बढ़ गए। हमलोग अब शिखर के करीब आ गये थे। यहाँ पार्किंग की व्यवस्था थी। अत: हमने अपनी गाड़ी पार्क कर शिखर की ओर बढ़ चले। शिखर तक जाने के लिए सीढ़ियाँ / रास्ते बने हुए है। लगभग शिखर तक रास्ते के दोनों तरफ खाने-पीने गिफ्ट, शृंगार आदि  की दुकाने सजी हुई है जो इसकी सुंदरता को थोड़ा कम करती है।
माउंट आबू शिखर के पास 

शिखर पर एक मंदिर है और उसके थोड़ा ऊपर एक बड़ी सी चट्टान है। चट्टान के ठीक सामने एक खम्बे पर बड़ीसी घंटी टंगी है। यहाँ पहुँचने के बाद सारी थकान दूर हो गई। सामने घाटियों से आती हवाएं पानी की फुहारों के साथ मिलकर रोमांस और आध्यात्म का मिलाजुला प्रभाव उत्पन्न कर रही थी। यहाँ हम चारों दोस्त डट गए। आंखे बंद कर इस पल को अंतर्मन में बसा लेने की हसरत पूरा करने लगे।
शिखर के पास लगा घंटा 
हमलोग काफी भीग चुके थे अब ठंड हमे छोड़ने के मूड में नहीं था, शरीर कंपन आरंभ कर चुका था और समय अपनी सीमा बताने लगा था फिर हमे अभी  दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर और ब्रम्ह्कुमारी प्रजापति का उपवन भी देखना था। अंतत: हम सारे अरमानो को समेटकर वापसी का रुख कर लिया। अब मौसम साफ होने लगा था। अत: हमरी गाड़ी  की स्पीड बढ़ चुकी थी। हम जल्दी ही हम ब्रम्ह्कुमारी प्रजापति संस्था के उपवन में पहुँच गए।   
यहाँ अनेक प्रकार के फूल, औषधी, झाड़ियाँ आदि लगी हुई थी। सबसे बड़ी बात यहाँ की आध्यात्मिक शांति थी जो एक विशेष प्रकार का आकर्षण उत्पन्न कर रही थी। यहाँ कुछ देर बैठकर समय बिताने का मन तो था लेकिन समयाभाव के कारण हम चाहकर भी ऐसा न कर सके। अब हमारा अंतिम लक्ष्य दिलवाड़ा का जैन मंदिर था। हम जल्दी ही मंदिर के प्रांगन में पहुँच गए। 
दिलवाड़ा का जैन मंदिर अपने बेहतरीन नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ जैनियों के 24 तीर्थंकरों की मूर्तियाँ अलग-अलग मंदिरों में बनी हुई है। प्रत्येक मंदिर को विशेष प्रकार की नक्काशियों से सजाया गया है। इसकी सुंदरता देखकर अपने भारतीय विरासत पर गौरवाविन्वत महसूस करने लगा यहीं पास में ही एक अधुरा मंदिर भी है जो प्राचीन मंदिर से बड़ा किन्तु समान नक्कासी के रूप में बनाने का एक प्रयास दिखाता है। शायद  निर्माता इसे पूरा न कर पाया हो।   
खैर यहाँ हमने काफी समय बिताया, लेकिन अब वापसी का समय हो रहा था। अत: हमलोग सीधा एक रेस्टोरेन्ट में गए वहाँ कुछ खाना खाया और वापस दिल्ली की और निकल पड़े। इस वादे के साथ कि माउंट आबू पुन: पधारेंगे किसी दूसरे मौसम में। 


              ------------------समाप्त ------------------ 

Monday, 16 September 2019

Udaipur and Mount Abu ki yatra उदयपुर, माउंट आबू (राजस्थान) की यात्रा भाग-1

घुमक्कड़ी में संयोग का बड़ा महत्व होता है। समय, पैसा, गाड़ी आदि सुविधाओं की उपलब्धता होने के बावजूद घुमक्कड़ी मुश्किल से ही हो पाती है,क्योकि संयोग नहीं बन पाता। शायद इसीलिए कहते है कि “घुमक्कड़ी किस्मत से मिलती है”। एक ऐसा ही संयोग जुलाई 2019 में उदयपुर एवं माउंट-आबू जाने का बना।   

मैं और मेरे तीन दोस्तों (विक्रम सिंह, अमित गुप्ता और अंशु सिंह) ने तीन दिनों का ट्रिप बनाया। प्लान के अनुसार हमे गुरुवार शाम को अपनी गाड़ी से दिल्ली से निकलना था और सोमवार की  सुबह वापस दिल्ली पहुँच जाना था। हमारे पास कुल तीन दिन थे जिसमे हमने दो दिन उदयपुर में और एक दिन माउंट आबू में घूमने का निर्णय किया।

तय समय के अनुसार हमलोग गुरुवार की शाम को विक्रम जी की गाड़ी से उदयपुर की ओर निकल पड़े। शाम में दिल्ली की पकाऊ ट्रैफिक जाम का सामना करते हुए “हमने दिल्ली जयपुर हाइवे पकड़ लिया ”। मानेसर पार करते-करते रात 10 बज चुके थे। अत: हम डिनर करने के लिए मानेसर से थोड़ी दूरी पर स्थित “मन्नत ढाबा” पर रुके। यहाँ का पराठा काफी प्रसिद्ध है। हमने पनीर पराठे खाये जो बेहद स्वादिष्ट थे। कुछ देर आराम करने के बाद हमलोग उदयपुर के लिए चल पड़े। अपने तीनों दोस्तों के साथ बात करते-करते रात का अंधेरा कब सुबह के उजाले में परिणत हो गया पता ही नहीं चला। सूरज के निकलने से पहले ही हमलोग झीलों की नगरी उदयपुर पहुँच चुके थे। हमलोगों ने एक अच्छी जगह पर होटल ले लिया  और आराम करने लगे।
पिछौला झील के बीच होटल  

उदयपुर अपने सुंदर-सुंदर झीलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पिछौला झील, फतेह सागर झील के अतिरिक्त अनेक छोटी-बड़ी झीले है। अरावली श्रेणी की पहाड़ियों के बीच बसा यह नगर बेहतरीन मौसम, हरियाली के साथ अपनी ऐतिहासिक संस्कृति के लिए भी प्रसिद्ध रहा है, जिसके अवशेष यहां आज भी देखे जा सकते हैं।


थोड़ी देर आराम करने के बाद तैयार होकर हमलोग उदयपुर दर्शन को निकल पड़े। सर्वप्रथम हमने फतेह सागर झील का चक्कर लगाया। बारिश कम होने की वजह से यह अभी पूरा भरा हुआ नहीं था। लेकिन फिर भी इसके चारो ओर हरे-भरे पहाड़ तथा इसके बीच में एक छोटा सा उधान इसकी सुंदरता में चार चांद लगा रहा था। इसके चारो ओर अच्छी सड़क बनी हुई है। नगर के लोग सुबह और शाम को यहां टहलने आते है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ अदभुत शांति प्रेमी जोड़ो को यहां आकर्षित करता है। अनेक जोड़े यहाँ आपस में ठिठोलियाँ करते नजर आए। खैर अब हमे अपने अगले पड़ाव की ओर जाना था। अत: अपनी भावनाओं को समेटकर हम अपनी गाड़ी में आकर बैठ गए।

हमारा अगला पड़ाव था सिटी पैलेस एवं पिछौला झील जो साथ ही लगा हुआ है। सिटी पैलेस मेवाड़ राज्य की समृद्धि और शान को व्यक्त करता है। इसके पीछे पिछौला झील है। यहाँ पर्यटको के लिए बोटिंग की सुविधा भी है। सिटी पैलेस तीन तरफ से पहाड़ी एवं एक तरफ से झील से घिरा हुआ है। जो इसकी सुरक्षा के साथ सुंदरता को भी बढाता है।
सिटी पैलेस 

सर्वप्रथम हमलोग सिटी पैलेस घूमे, उसके बाद पिछौला झील में बोटिंग किया। झील के बीच में एक होटल बनाया गया है जहां तक बोट के सहारे पहुंचा जाता है। झील के बीच से सिटी पैलेस बेहद खूबसूरत लग रहा था। यांत्रिक बोट की स्पीड भी रोमांच का अनुभव करा रहा था। लगभग दो घंटे यहाँ व्यतीत करने के बाद हमलोग जंगल सफारी की ओर चल पड़े।   
    
सिटी पैलेस से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर वन विभाग का एक उधान है जहाँ घुमा जा सकता है। यहां नाममात्र की फीस ली जाती है। फीस चुका कर हमलोग जंगल में प्रवेश कर गए। यहां अनेक प्रकार के पक्षी दिखाई दे रहे थे लेकिन कोई खतरनाक पशु नहीं था। पर्यटको के लिए यहां झूले लगे थे जिन्हे देखकर हमारे मित्रों के अंदर का बचपना जाग उठा और फिर “सावन के झूलों ने मुझको बुलाया” जैसा माहौल बन गया। थोड़ी देर बाद हमलोग जंगल में और आगे बढ्ने लगे। हमलोगों के अलावा इस जंगल में एक फैमिली और दिखी जो वापस जा रही थी। सुनसान जंगल और दिन के ढलने के कारण हमने भी वापसी का रूख कर लिया। 
जंगल सफारी में झूला झूलते मित्र 
     
अब हमारा अगला पड़ाव मानसून पैलेस था जो उदयपुर की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित था। यधपि यह काफी ऊँचाई पर स्थित है लेकिन वहां तक पहुँचने के लिए सड़क बनी हुई है। अत: हमलोग अपनी गाड़ी से यहां पहुँच गए। यहा से पूरा उदयपुर नगर देखा जा सकता है। यहां से शहर देखने के बाद हमे भी विश्वास हो गया कि सचमुच यह झीलों की नगरी ही है। क्योंकि शहर के किनारे और बीच में अनेक झील दिखाई दे रहे थे।

मानसून पैलेस को यहां के राजा ने मानसून में बारिश के रोमांटिक स्वरूप को निहारने के लिए बनवाया था। हमलोग जब यहाँ पहुंचे थे तो शाम के 3:00 बजे रहे थे, धीरे-धीरे बादल जमा हो रहा था और लग रहा था कि हमे भी यहाँ कि बारिश में भीगने को सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। हमलोग यहाँ से नगर को देख रहे थे, फिर यहाँ बने महल की ओर गए, जिसके दूसरे छोर पर पर्यटक के बैठने के लिए बेंच लगी थी और कुछ पर्यटक जमा थे।
मानसून पैलेस में मित्रों के साथ 

देखते-देखते मौसम ने अंगड़ाई ली और तेज हवा के साथ हल्की बारिश (फुहारा) चलने लगा। तेज हवा और बारिश से बचने के लिए अनेक पर्यटक महल के अंदर चले गए। लेकिन हम तो इस मौसम का इंतजार कर रहे थे। अत: हम चारों खाली बेंच पर बैठकर मौसम के रूमानी अंदाज को महसूस करने लगे। “ऊंची चोटी पर खड़ा होकर, तेज हवाओं के झोंकों के साथ पानी की फुहार को जब आँख बंद कर महसूस किया जाता है तो एहसास होता है कि प्रकृति अपने अंदर कितनी खूबसूरती, प्रेम और रोमांच को समेटे हुए है ”। लग रहा था कि बस ऐसे ही यहाँ बैठे रहे। लेकिन समय का अपना महत्व होता है। अंधेरा होने से पहले हमे इस चोटी से उतर जाना था। अत: दिल पर पत्थर रखकर भारी मन से वापस आना पड़ा। 

नीचे उतरते-उतरते अंधेरा होने लगा था लेकिन हमारे सारथी और गाईड मित्र विक्रम जी के मन में अभी भी एक स्थान पर जाने की लालसा बची हुई थी। यह लालसा थी शाम को झील किनारे दोस्तों के साथ मस्ती करने की। रास्ते में हमने कोल्ड-ड्रिंक्स और स्नैक्स खरीद लिया और शहर से थोड़ी  दूर पर स्थित झील के किनारे पहुँच गए। यधपि अंधेरा हो रहा था लेकिन इस झील के किनारे लड़कों का झुंड एवं प्रेमी जोड़े बैठे हुए थे। हमने भी एक किनारा पकड़ लिया और आपस में बात करने लगे।   
फतेह सागर झील का आनंद लेते हुए 

अंधेरा जैसे-जैसे बढ़ रहा था वैसे-वैसे प्रेमी जोड़े अपने-अपने घरो को वापस जा रहे थे। लेकिन अपनी धुन में मस्त हम “चार यार” रात गुलजार करने में लगे थे। रात का अंधेरा, झील की शीतलता, पहाड़ की शांति, चिड़ियों की चहचहाहट एक विचित्र शांति का एहसास करा रही थी। शहर से दूर अनजान  झील के किनारे हम चार दोस्त एक अलग प्रकार के डर और रोमांच का अनुभव कर रहे थे। खैर रात के 9:00 बजने वाले थे। अत: हमलोग वापस अपने होटल की ओर चल पड़े। अंधेरा अधिक होने के कारण रास्ता भटकने का डर भी लग रहा था, फिर भी यह विश्वास था कि अनजान रास्तों से घुममकड़ों का मित्रवत संबंध होता है और कोई मित्र अपने मित्र को गलत रास्ता नहीं बताता। इस विश्वास ने सही रास्ता दिखाया और हम सकुशल अपने होटल पहुँच गए। हमने रास्ते में ही खाना खा लिया था, थोड़ी थकान भी हो गई थी। अत: हम जल्द ही सो गए।  

दूसरे दिन, हम जल्दी उठे और तैयार हो गए। हमे होटल खाली कर अपना समान अपनी गाड़ी में रखना था क्योंकि उदयपुर के कुछ स्थानों को देखकर हमे शाम तक माउंट-आबू जाना था। जहाँ हमलोग रात को ठहरते। सामान पैक कर हमने अपनी गाड़ी में रख दिया और होटल वाले का बिल चुकाकर आज के पहले पड़ाव की ओर चल दिए। एक बार फिर हमलोगों ने फतेह सागर झील का चक्कर लगाया और नीमच माता मंदिर की ओर चल दिए।
नीमच माता 
नीमच माता को उदयपुर की वैष्णो देवी कहा जाता है, मंदिर एक पहाड़ी की चोटी पर है जहाँ ट्रेकिंग कर जाया जाता है। 1.5 Km की खड़ी चढाई करने के बाद हमलोगो ने मंदिर के दर्शन किए। इस मंदिर में स्थानीय लोग मन्नत मांगने आते है और मन्नत पूरा होने पर भंडारा का आयोजन करते है। मंदिर के पास अधिक भीड़ नहीं होने के कारण शांति थी। अत: हमलोग मंदिर के दूसरे छोर पर रखे बेंच को अपने हिसाब से सेट कर बैठ गये, यहाँ आने वाली हवाएँ अपने साथ झील की ठंडक और पहाड़ी जंगल की खुशबू ला रही थी जो दोपहरी की धूप में भी सुकून दे रहा था। कुछ देर यहां समय बिताने के बाद हमलोग नीचे आ गए। 
नीमच माता का मंदिर 
 
हम पुन: फतेह सागर झील के पास पहुँच गये जिसके एक किनारे की पहाड़ी पर महाराणा प्रताप म्यूजियम तथा एक विशाल मूर्ति लगी हुई है। टिकट कटा कर हमलोग प्रवेश कर गए। सबसे पहले हमलोग महाराणा प्रताप की विशाल प्रतिमा को देखने गए। प्रतिमा पहाड़ी की चोटी पर बना है जो महाराणा प्रताप के शौर्य को व्यक्त करता है। दोपहरी में जब सूरज अपनी पूरी शक्ति से किरणे बिखेर रहा था। उस समय भी यह स्थान सुंदर लग रहा था यहां भामाशाह एवं हाकिम खाँ सूरी की मूर्तियाँ भी बनाई गई है। इसके थोड़ा नीचे झील की ओर कुछ स्थानो को इस तरह बनाया गया है कि आप झील की खूबसूरती का आनंद ले सके।   
महाराणा प्रताप स्मारक 

यहाँ से नीचे उतरते समय एक प्राचीन किला का अवशेष भी देखने को मिला। अब हमलोग म्यूजियम के पास पहुँच गए। गार्ड ने टिकट मांगा तो हमलोग अमित जी की ओर देखने लगे क्योंकि टिकट उनके पास था, लेकिन यह क्या? अमित जी के पास भी टिकट नहीं था। हम सारे दोस्त अपनी-अपनी पॉकेट देखने लगे लेकिन टिकट नहीं मिला। शायद खो गया था ! अत: हमारे पास दो विकल्प थे कि टिकट पुन: खरीद कर लाया जाय अथवा बिना देखे ही प्रस्थान किया जाय।
म्यूजियम के बाहर का फोटो 

विक्रम जी ने तीसरा विकल्प चुना कि गार्ड को यह विश्वास दिलाया जाय कि हमने टिकट खरीद था क्योंकि बिना टिकट के मुख्य द्वार से प्रवेश ही नहीं था। चूंकि हम चारों व्यक्ति सरकारी सेवा मे थे अत: पहले गार्ड को फिर उनके अधिकारी को विश्वास दिलाने में सफल रहे कि हमने टिकट खरीदा था। अत: मूजियम में प्रवेश मिल गया। “यहाँ महाराणा प्रताप के हथियार (भाले, तलवार), पोशाक के साथ चितौडगढ़, रणथमभौर, उदयपुर के सिटी पैलेस की प्रतिकृति रखी हुई है, जो बेहद आकर्षक प्रतीत होता है। छोटा म्यूजियम होने के कारण जल्द ही पूरा म्यूजियम देख लिया। अब हमे भूख लगने लगी थी। 
कुम्भलगढ़ दुर्ग की प्रतिकृति  

खाने-पीने के लिए उदयपुर का सुखाड़िया सर्किल है। यहाँ अनेक प्रकार के फास्ट फूड मिलते है। हमने भी यहाँ के फास्ट-फूड का आनंद लिया फूड स्वादिष्ट था। फास्ट फूड की दुकानों के साथ यहाँ अलग-अलग प्रकार के पानी –पूरी वालों का ठेला भी लगा था। अत: हमने भी यहाँ के पानी-पूरी का स्वाद चख लिया। यहाँ से हमलोगों को माउंट आबु की ओर प्रस्थान करना था। चूंकि घड़ी में समय 3:30 बजे दिखा रहा था। अत: बिना देरी किए हमलोग प्रस्थान कर गए।  


                  सफर जारी है .............................     

Monday, 9 September 2019

Khajjiar. डलहौजी दैनकुण्ड-खजियार-कालाटॉप यात्रा भाग-II


         अबहमलोग काला टॉप उधान की ओर बढ़ रहे थे। दैनकुण्ड बेस पॉइंट से काला टॉप 8 Km है। लेकिन पहाड़ी रास्तो के कारण हमे वहाँ पहुँचने में एक घंटा लग गया।
काला टॉप 


काला टॉप एक वाइल्ड लाइफ सेंचुरी है। यह चम्बा जिला में पड़ता है। यह लगभग 20 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ काला भालू सहित अनेक पशु पक्षी पाए जाते हैं। यहाँ वन विभाग का गेस्ट हाउस भी है। शंकुधारी वन तथा ओक के वृक्ष बड़े पैमाने पर हैं। इसके थोडी दूर से रावी नदी गुजरती है, जो इसकी सुंदरता को और अधिक बढ़ा देती है।
काला टॉप उधान के अंदर गाड़ी ले जाने की फीस 250/- रूपये है, जो गेस्ट हाउस तक जाती है। यदि आपके पास समय कम है तो गाड़ी से जा सकते है लेकिन यदि आप ट्रेकिंग और प्रकृतिक एडवेंचर का आनंद लेना चाहते है, तो आप इस छोटी सी ट्रेकिंग (3 Km) को प्राथमिकता दे, क्योंकि गाड़ी से गेस्ट हाउस तक पहुँचने में मात्र 15 मिनट लगते है  और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद भी जल्द खत्म हो जाता है”। गेस्ट हाउस तक पहुँचने के बाद यहाँ के रोमांटिक मौसम का आनंद लिया जा सकता है। बड़े-बड़े पेड़ों के बीच बना पार्क में धुंध काफी अधिक था। हल्की-हल्की बारिश मे मौसम रोमांटिक होने लगा । हमलोग पार्क मे रखे बेंच पर बैठ गए और प्रकृति के साथ अपनी भावनाओं को जोड़ने का प्रयास करने लगे। ठंड और बारिश ने हमे सुकून तो पहुंचाया लेकिन सिंगल होने का दर्द भी बढ़ा दिया।
काला टॉप 


खैर अब बारिश अधिक होने लगी थी। अत: हमलोग पुन: अपनी गाड़ी में बैठ गए और खजियार के लिए निकाल पड़े। यहाँ से खजियार लगभग 22 Km है। खजियार पहुँचने में हमे 1.5 घंटे लगे। हमलोगो ने खजियार में ही रुकने का प्लान बनाया था और होटल बुक करा लिया था। अत: हम सीधे होटल पहुँच गए और कुछ देर आराम करने के बाद खजियार की शाम का लुफ्त उठाने को तैयार हो गए।
खजियार चारो तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ है, शंकुधारी वृक्ष के बड़े-बड़े पेड़ों से ढके होने के कारण यह  “हरा कटोरा (Green Bowl) जैसा दिखता है। यहाँ रहने के लिए 8-10 होटल बने हुए है, जो काफी महंगे है। यहाँ का रूमानी मौसम और प्राकृतिक सौंदर्य काफी आकर्षक है।
खजियार 


शाम जैसे-जैसे ढल रही थी खजियार के चारो ओर दूर स्थित बर्फ के पहाड़ भी अपना रंग बदलने लगे थे जो इसकी सुंदरता पर चार चाँद लगा रहे थे। ठंड बढ़ने लगी थी अत: हमलोग अपने होटल में आ गए। होटल वाले को खाना बनाने को बोल दिया। आधे घंटे में खाना बन गया और हमने खाना खा लिया। अब हमलोग अगले दिन की यात्रा और खजियार में पैराग्लाइडिंग करने का प्लान बनाने लगे। जल्द ही यह तय हो गया कि हम सुबह जल्दी उठ कर सूर्योदय देखेंगे और पैराग्लाइडिंग कर वापस डलहौजी तथा वहाँ से दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।
प्लान के अनुसार हमलोग सुबह जल्दी उठे और तैयार होकर सूर्योदय देखने निकल पड़े ।  पहाड़ों मे सूर्यास्त देखने का अपना अलग ही मजा है। सूर्य जैसे-जैसे अपनी लालिमा बिखेरता है वैसे-वैसे बर्फ से ढके पहाड़ भी अपना रंग बदलते है। कुछ ही देर में सूरज अपनी पूरी शक्ति से चमकने लगा था जो ठंड को भागने पर मजबूर कर रहा था।
अब हमलोग पैराग्लाइडिंग करने के लिए चल पड़े। यहाँ पैराग्लाइडिंग कराने वाले से मोल भाव करना उचित लगा। हमे बताया गया कि पैराग्लाइडिंग के लिए छोटी दूरी वाला 1500 रु तथा लंबी दूरी का 2500 रु लगेगा। लेकिन काफी मोल-भाव करने के बाद वह लंबी दूरी से पैराग्लाइडिंग कराने के लिए 1500/- मे ही तैयार हो गया। शायद इसलिए भी क्योंकि उनका यह ऑफ सीजन था अत: ग्राहको की संख्या सीमित थी।
खजियार 


मैं और आकाश ऑपरेटर के साथ टैक्सी में सवार हो गए और एक नए रोमांच का मजा लेने का इंतजार करने लगे। ऑपरेटर हमे काफी ऊंचाई पर स्थित गाँव के पास ले गया और वहाँ से लगभग 1 KM की चढ़ाई करने को बोला। वह स्वयं भी पैराशुट लेकर चढ़ाई करने लगा। हमे बताया गया कि ऊंचाई पर चढ़कर वहाँ से पैराशुट लेकर कुदना है। लगभग 40 मिनट कि चढ़ाई ने हमे थका दिया था लेकिन मन में उड़ने का रोमांच बना हुआ था जो थकान को मात दे रहा था।
अब यहाँ से हमे पैराशुट के साथ अपनी उड़ान भरनी थी। मन में डर और रोमांच का घमासान चल रहा था। पायलेट ने पैराशुट खोला और उसमे बंधे दो कुर्सीनुमा सरंचना से एक मुझे और एक स्वयं को बांध लिया। उसने हमे सख्त  हिदायत दी कि जब मैं कहूँ तब पैराशुट को लेकर दौड़ना है। दौड़ने में चूक हुई तो हम दोनों खाई में गिर सकते हैं। उसने जैसे ही दौड़ने को कहा मैं तेजी से दौड़ने लगा लेकिन ये क्या? न तो में तेजी से दौड़ पा रहा हूँ और न ही पैराशुट को खींच पा रहा हूँ। जब तक मैं कुछ समझ पाता  मैं हवा में उड़ रहा था।

  
हवा में इतनी ऊंचाई पर उड़ने का ये मेरा पहला अनुभव था। हृदय कि धड़कन बढ़ी हुई थी और मैं सब कुछ भूल-कर आसमान से पहाड़ और जंगलो को देख रहा था। एक पल तो यह भी विचार आया कि यदि यहाँ से गिरा तो किसी पेड़ पे अटकुंगा या सीधा पहाड़ पर टपकुंगा। नहीं ऐसा नहीं होगा क्योंकि पैराशुट के साथ हमारा पायलट भी तो है। ये सब मन में चल ही रहा था कि पायलट ने हवा में कलाबाजी दिखा दी। “एक पल तो ऐसा लग रहा था कि मैं पैराशुट के उपर और पैराशुट नीचे चला गया है। मुझे लगा कि अब तो मैं गया ”लेकिन पैराशुट को स्थिर करते हुए पायलट ने कहा कि जब तक कलाबाजी न करो मजा नहीं आता है। मैंने भी हुंकारी भरी लेकिन अंदर ही अंदर डर भी रहा था। 
तीन-चार बार कलाबाजी करने के बाद पायलट ने पैराशूट को नीचे लाना शुरू कर दिया जहां गाँव के छत पर एक छोटी बच्ची दिखी जो हमे देखकर बाय बाय” कर रही थी मैने भी चिल्ला कर उसे बाय बोल दिया। अब हम लैंडिंग करने वाले थे अत: पायलट ने हमे सलाह दिया कि अपना पैर उपर कर लेना नहीं तो पैर टूट सकता है और कमर में दर्द हो सकता है। मैंने वैसा ही किया और हमारी लैंडिंग आसानी से हो गई। 8-10 मिनट कि उड़ान बेहद रोमांचक भरी रही। वहाँ से हमे टैक्सी में बिठाकर खजियार छोड़ दिया गया जहां अमित जी हमारा इंतजार कर रहे थे।
अब हमे यहाँ से डलहौजी जाना था जहाँ से हमे दिल्ली के लिए बस लेनी थी। खजियार से डलहौजी जाने के लिए बस 10:00 बजे से 1:00 बजे और 4:00 बजे मिलती है, चूंकि हमे डलहौजी से 3:00 बजे के आस-पास बस पकड़नी थी अत: हमलोग टैक्सी से ही डलहौजी आ गए और वहाँ से रोमांचक एवं यादगार अनुभव लिए वापस दिल्ली की बस में सवार हो गए। अगले दिन सुबह-सुबह हम एक खुबसूरत सफर समाप्त कर दिल्ली पहुँच गए।
संबन्धित जानकारी:-  
      डलहौजी-खजियार-दैनकुण्ड-कालाटॉप घूमने के लिए बेस पॉइंट डलहौजी को बनाया जा सकता है। प्रथम दिन डलहौजी लोकल घूमे। दूसरे दिन दैनकुण्ड और कालाटॉप तथा तीसरा दिन खजियार घूम कर शाम को वापसी कर सकते है।
यदि आपके पास केवल दो दिन ही है तो आप पहले दिन में सुबह जल्दी उठकर कालाटॉप और दैनकुण्ड कर ले और शाम को डलहौजी लोकल घूम सकते है। तथा दूसरे दिन खजियार में पूरा दिन बिता सकते है।
कब जाएं:-
      डलहौजी वर्ष भर जाने लायक है लेकिन फिर भी यहाँ मई से दिसम्बर में लोग जाना अधिक पसंद करते है। जनवरी से मार्च तक बर्फ देखने भी जाया जा सकता है।

                              समाप्त

Tuesday, 18 June 2019

Dalhousie-khajiyar- dainkund ki yatra. डलहौजी- खजियार –दैनकुंड की यात्रा (भाग-I)

घुम्मकड़ नव वर्ष के आगमन के साथ अपनी यात्राओं की संभावित सूची बनाता है और उसे पूर्ण करने का भरसक प्रयास करता है। लेकिन कहते है न कि घुम्मक्डी किस्मत से मिलती है, ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ नव वर्ष 2019 के आगमन के साथ हमने भी हिमाचल या उत्तराखण्ड में स्नो ट्रैकिंग करने का प्लान बनाया लेकिन कार्य की व्यस्तता में ऐसा उलझा कि जनवरी से मार्च कब निकल गया पता ही नहीं चला। फिर किस्मत ने अप्रैल 2019 में घुम्मक्डी का मौका दिया । बिना देर किए  मैं और मेरे दो मित्र (अमित एवं आकाश) डलहौजी हिमाचल प्रदेश घूमने निकाल पड़े।
डलहौजी 

      दिल्ली से डलहौजी जाने के लिए कई विकल्प उपलब्ध होते है। आप हिमाचल रोडवेज अथवा प्राइवेट बस से सीधे डलहौजी पहुँच सकते है। अगर आप बस की यात्रा कम से कम करना चाहते हैं, तो रेल द्वारा आप पठानकोट पहुँच सकते है।यहाँ निजी वाहन (कार/बाइक) से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है।
      हमलोग दिल्ली से पठानकोट के लिए पुरानी दिल्ली से ट्रेन में बैठ गए। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व हमलोग पठानकोट पहुँच गए थे। रेलवे स्टेशन से बस अड्डे तक जाने के लिए ऑटो लिया। ऑटो में बैठने की व्यवस्था तथा सवारी की संख्या दिल्ली में चलने वाले मिनी बस की तरह  थी अंतर सिर्फ इतना था कि मिनी बस के चार चक्के होते है और ऑटो के तीन ही थे। ड्राइवर भी एक सामान्य पंजाबी की तरह खराब सड़क पर भी गाड़ी तेजी से चलाकर बचते बचाते बस स्टैंड तक छोड़ दिया।
      अब हमलोग डलहौजी जाने वाली बस में सवार हो गए। पठानकोट से बस खुल चुकी थी लेकिन मेरे मन में अधिक खुशी नहीं थी क्योंकि डलहौजी घूमने का आइडिया मेरा नहीं था अपितु मेरे मित्र अमित गुप्ता का था। वस्तुत: मुझे बर्फ से लदे पहाड़ अधिक अच्छे लगते है और डलहौजी के बारे में कहा जाता है कि यहाँ मार्च के बाद बर्फ नहीं दिखते क्योंकि इस समय यहाँ ग्रीष्म ऋतु होती है।
      मेरे मन में अनेक तरह के विचार आ-जा रहे थे और दूसरी ओर बस अपनी रफ्तार पकड़ती जा रही थी। पठानकोट शहर से बस आगे निकल चुकी थी लेकिन मै अभी भी अपने विचारो में  उलझा हुआ था। अचानक आम के मांजर (आम का फूल) कि खुशबु से सराबोर हवा के झोंकों ने मुझे आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में ला दिया। खिड़की के बाहर देखा तो सड़क के दोनों किनारों पर लगे आम के पेड़ अपनी नव यौवन की मादकता से पूरे वातावरण को मदहोश बना रहे थे। तब हमे स्मरण हुआ कि मार्च-अप्रैल का महिना उष्णकटिबंधीय पर्णपाति वनो में फूलो के खिलने का समय होता है न केवल आम अपितु अन्य पेड़-पौधे, झांडियों पर भी फूल खिले दिख रहे थे। अब शिवालिक हिमालय कि घाटियां दिखने लगी थी जैसे-जैसे हम डलहौजी के नजदीक पहुँचते जा रहे थे चेहरे पर खुशी बढ़ती जा रही थी। सड़क के किनारे दोनों ओर जंगल भी घना होता जा रहा था। वस्तुत: पठानकोट के बाद ही पहाड़ी की चढ़ाई शुरू हो जाती है, और प्रकृतिक सौंदर्य के दर्शन से आंखो को जहाँ सुकून मिलता है वही स्वच्छ हवाएं हिमालय की ठंडक के साथ मिलकर घुमक्ड़ो की थकान को दूर कर देती है।
दैनकुंड पहाड़ की बर्फ से ढकी चोटियाँ  

      अतत: हमलोग दोपहर के पहले ही डलहौजी पहुँच गए। यहाँ का मौसम ठंडक से भरा था। अत: हुमलोगों ने बस से उतरते ही अपना गर्म जैकट निकाल कर पहन लिया।
       “डलहौजी एक छोटा शहर है जो पाँच पहाड़ियो से घिरा हुआ है। यह मध्य हिमालय और लघु हिमालय के मध्य में स्थित है । यहाँ का मौसम संतुलित है जो एक तरफ आपको हिल स्टेशन की खुबसुरती का एहसास दिलाता है तो दूसरी तरफ चरम मौसमी परिस्थितियो से भी बचाता है। इसका नाम लार्ड डलहौजी एक ब्रिटिश गवर्नर जनरल के नाम पर पड़ा है। डलहौजी के काल में ब्रिटिश भारत का सेना मुख्यालय यहाँ बनाया गया था। यधपि अब सेना का मुख्यालय दिल्ली को बना दिया गया है लेकिन डलहौजी में भी इसके साक्ष्य देखे जा सकते है। डलहौजी में दो प्रमुख चौक है। गांधी चौक और सुभाष चौक, कहा जाता है कि सुभाष चन्द्र बोस औपनिवेधिक कल में यहाँ रहे थे। गांधी चौक अधिक विकसित है क्योंकि यहाँ खजियार, चंबा, दैनकुण्ड व अनेक स्थानो के लिए बस / टैक्सी मिलता है मुख्य बाजार भी यहीं है। लेकिन आपको टैक्सी लेनी हो तो एक बार सुभाष चौक की और भी चले जाए क्योंकि यहाँ आपको सस्ती दर पर टैक्सी मिल सकती है। डलहौजी में दो चर्च है एक सुभाष चौक के पास तो दूसरा गांधी चौक के पास। ये चर्च इसकी औपनिवेधिक विरासत को स्पष्ट करते है।
      डलहौजी अपने अच्छे बोर्डिंग स्कूलो के लिए भी जाना जाता है। यहाँ डलहौजी पब्लिक स्कूल, डलहौजी हील टॉप स्कूल अधिक प्रसिद्ध है जहां न केवल पूरे भारत से बच्चे पढ़ने आते हैं अपितु NRI (विदेशो से बसे भारतीय) के बच्चे भी आते हैं। मशहूर फिल्म “तारे जमीन पर” का पेंटिंग वाला द्रश्य भी यहीं शूट किया गया था। यहाँ के घने वन जिसमे पाइन, ओक, स्फ़्रूस, आदि के पेड़ों की बहुलता इसे और अधिक मनमोहक बनती है।
      हमलोगों ने पहले से ही होटल बुक कर रखा था अत: हम जल्द ही होटल पहुँच गए और तैयार होकर घूमने का प्लान बनाने लगे। डलहौजी लोकल मे चर्च, तिब्बती मार्केट,सात धारा, पंचपूला जल प्रपात तथा  स्थानीय मार्केट है ,यहाँ आप प्रथम दिन मे घूम सकते है । इन सभी स्थानो में सबसे अच्छा पंचपुला लगा। यधपि यहां छोटा सा जल प्रपात है लेकिन फिर भी यहां बच्चो के लिए वाटर पार्क, युवाओं के लिए एडवेंचेर्स एक्टिविटी के साथ खाने पीने की अच्छी व्यवस्था मिल जाती है।
      डलहौजी की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक आप खजियार, दैनकुण्ड और काला टॉप वाइल्ड लाइफ उधान की यात्रा नहीं कर लेते। डलहौजी के पास ही चमेरा लेक भी है। इस सभी जगह जाने के लिए आपको अपनी गाड़ी अथवा टॅक्सी लेनी पड़ती है। यदि टॅक्सी लेनी हो तो शाम में ही बुक कर ले ताकि सुबह जल्दी निकला जा सके। हमने भी ऐसा ही किया और सुबह-सुबह दैनकुण्ड के लिए निकल पड़े। दैनकुंड नाम कोई झरना अथवा जल स्रोत का भान कराता है लेकिन ये एक पर्वत शिखर है जहां आपको ट्रैकिंग कर पहुंचना होता है। हम तीनों मित्र टैक्सी में सवार होकर प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने हुए जा रहे थे साथ ही ड्राइवर से डलहौजी में रहने वाले स्थानीय लोगो के जीवन के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर रहे थे।   
      सड़क के किनारे पर बड़े-बड़े पेड़ तो दूसरी तरफ खाई हिमालय क्षेत्र की विशेषता है, लेकिन जब खाई की दूसरी तरफ दूर स्थित हिमालय के बर्फ से ढकी चोटियाँ दिखती है तो खाई की ओर कौन  देखता है। हमारी गाड़ी दैनकुण्ड की और बढ़ रही थी और हमलोग बाहर सौंदर्य से मंत्रमुग्ध हो रहे थे। अब पेड़ो के साथ-साथ  सड़क किनारे बर्फ भी दिखने लगे थे। जल्द ही हम दैनकुण्ड के बेस पॉइंट पर पहुंच गए। गाड़ी वाले ने गाड़ी पार्क कर दी और हमे वापसी में यही मिलने को बोल कर अपने अन्य मित्रों के पास चला गया।
दैनकुंड ट्रैकिंग रूट 
      अब यहाँ से 3.5-4 KM की छोटी चढ़ाई हमे करनी थी। हम तीनों भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ चले। लगभग एक किलो मीटर के बाद ही हमे पेड़ की छावों ने अलविदा कह दिया। अब खुले पहाड़ थे  जहां से पूरा डलहौजी देखा जा सकता था। हमारे आगे-आगे दक्षिण भारत से आई  बच्चो की टोली भी चल रही थी  जिसमे कुछ बच्चे सबसे आगे तो कुछ बच्चे बहुत पीछे थे। पीछे रह गए बच्चो का हौसला बढ़ाने  के लिए उनके PT मास्टर लगातार प्रयास कर रहे थे। हमलोग तेजी से उन बच्चो को पीछे छोड़ दिया और आगे निकाल गए। आगे रास्ते पर बर्फ पड़ी थी जो स्नो ट्रैकिंग का आनंद भी दे रही थी, विशेषकर मेरे लिए तो यह टूटे सपने के पुन: जुडने जैसा था क्योंकि अप्रैल में डलहौजी जैसे अपेक्षाकृत आसान ट्रैकिंग पर बर्फ मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
      जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे हवाएँ तेज होती जा रही थी  और मौसम बदलने लगा था। आसमान में बादल दिखाई देने लगा था और सूरज उसके पीछे छुप गया था। अब ट्रैकिंग मे और अधिक आनंद आ रहा था । पहाड़ी कुत्ते बर्फ पर उछाल-कूद कर अटखेलिया कर रहे थे जो प्रकृति के साथ उसके आत्मीय संबंध को प्रकट कर रहे थे।
दैनकुंड चोटी पर माता का मंदिर 

      दैनकुण्ड के शिखर पर माता का मंदिर है जहां स्थानीय लोग मन्नत मांगते है और मन्नत पूरी होने पर भंडारा कराते है । यहाँ छोटी-छोटी 3-4 दुकाने भी है जो प्रसाद एवं स्नैक्स,पानी आदि उपलब्ध  कराते है। हमलोग मंदिर पहुंच गए और माँ का आशीर्वाद लिया। बाहर एक व्यक्ति भंडारा में छोले-भटूरे बांट रहा था। हमने भी उसका स्वाद चखा  “ मजा आ गया ” । कुछ लोग मंदिर से ऊपर भी चढाई करते है जबकि अन्य वही से वापस हो जाते हैं । हमने उपर और चढ़ाई करने का मन बनाया । ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ को देखर अमीत भाई का मन तैयार नहीं हो रहा था लेकिंन आग्रह करने के बाद वो मान गए। हमलोग आगे चढाई करने लगे।
      यहाँ रास्ते के साथ-साथ ढालान पर भी बर्फ जमी हुई थी जो स्नो ट्रैंकिंग की कठिनाई और आनंद दोनों प्रदान कर रही थी। हमलोग पहली और फिर दूसरी चोटी तक पहुंच गए थे लेकिन हवाएं तेज हो गई थी और बादल पूरी चोटी को अपनी आगोश में ले रहा था। घाटियों से आते बादल के झुंड बड़े प्यारे लग रहे थे कुछ देर में ही हमे बदलो ने घेर लिया बदलो और ठंडी हवाओं के संगम ने हमे स्वर्गलोक की यात्रा  का एहसास करा दिया। दिल से निकाल रहा था कि किसी शंहशाह की तरह हम भी कह दे कि “ पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यही है यही है यही है ” वस्तुतु: कहा जाता है कि भारत में डलहौजी “ धुंध का शहर ” के नाम प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ वर्ष भर धुंध रहता  है। काफी देर यहाँ व्यतीत करने के बाद हम भारी मन से नीचे कि ओर  बढ्ने लगे। नीचे उतरते समय हमे पुन: बच्चो कि टोली मिल गई जो अब अपनी मंजिल तक पहुंच कर बर्फ के साथ मस्ती कर रहे थे । लौटते समय एक स्थान पर एक स्थानीय व्यक्ति चाय बना रहा था उसके साथ उसकी छोटी बच्ची भी थी जो उतनी ठंड में भी कुछ पैसे अर्जित करने में अपने पिता की मदद कर रही थी। इसलिए कहा जाता है कि पहाड़ घूमने के लिए अधिक अच्छे लगते है, लेकिन यहाँ जीवन-बसर करना काफी कठिन होता है।
 
दैनकुंड 
 हमलोग दैनकुंड बेस पॉइंट के नीचे आ चुके थे । बेहद थकान के बावजूद मन में जोश बना हुआ था, अब हमे यहाँ से काला टॉप की और प्रस्थान करना था। हम लोग टॅक्सी में बैठ गए और एक नए मंजिल की ओर चल दिए । 


क्रमश:॰..............................................................................

काला टॉप एवं खजियार कि यात्रा अगले भाग में               

National Police Memorial / राष्ट्रीय पुलिस स्मारक

21 अक्टूबर 2018 को  नई दिल्ली मे राष्ट्रीय पुलिस स्मारक की स्थापना के साथ ही दिल्ली के पर्यटन स्थलो के  हार मे एक और मोती जुड़ गया। यह न केव...