उदयपुर की यात्रा समाप्त कर हम माउंट आबू की ओर बढ़ चले थे। उदयपुर से माउंट आबू 160-180 Km है। रास्ता अरावली श्रेणी के हर-भरे पहाड़ियों के बीच से गुजरता है। सड़के अच्छी बनी हुई है। हमारे मित्र ''विक्रम जी" कई बार माउंट आबू जा चुके थे अत: वे हमे माउंट आबू के बारे में बता रहे थे।
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| चार चौकड़ी |
गाड़ी तेज गति से आगे बढ़ रही थी, हमलोग पल-पल माउंट आबू की ओर बढ़ रहे थे, मन में राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन को देखने की उत्सुकता भी बढ़ती जा रही थी, लेकिन रास्ते भी कम न थे। ढलती शाम के साथ-साथ बादल भी पहाड़ों को छु कर अठखेलियां कर रहे थे। छोटी-छोटी पहाडियां, हरे-भरे जंगल के बीच बादलों का आना इतना मोहित कर रह रहा था कि हमे अपनी गाड़ी रोक कर कुछ देर इन्हे निहारने को मजबूर होना पड़ा। विक्रम जी ने एक छोटी सी झोपड़ी के किनारे गाड़ी रोकी। यहां एक स्थानीय लड़का चाय बना रहा था, उसे चार चाय बनाने को बोलकर हमलोग थोड़ी दूर एक बड़े पत्थर पर बैठ कर प्रकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने लगे। कुछ देर में हमारी चाय आ गई। लड़के ने अच्छी चाय बनाई थी चाय पी कर कुछ फोटो लिए और वहां से आगे बढ़ चले।
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| Roadside View |
शाम ढाल रही थी, मौसम भी बदल रहा था लेकिन फिर भी माउंट आबू पहुँचने की जल्दी नहीं थी क्योंकि हमने सुन रखा था कि वहाँ रहने की कोई समस्या नहीं होती है। वहां अनेकों होटल, धर्मशाला आदि है। अब चढ़ाई शुरू हो गई थी जो हमे उतरखण्ड की याद दिला रहा था। बीच-बीच में View Points भी बने हुए थे जहां हमलोग उतरकर फोटो खीच रहे थे । लगभग 9 बजे हमलोग माउंट आबू पहुँच गए।
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| ढलती शाम |
यहाँ काफी भीड़-भाड़ थी, लग रहा था कि हमलोग मेले में आ गए है। खैर अब हमे होटल ढूंढना था। बड़ी मुश्किल से गाड़ी पार्क करने की जगह मिली गाड़ी पार्क कर हम होटल ढूंढने लगे। एक-दो होटल में पूछा तो बताया गया कि होटल में कमरे बुक है। हमने सोचा कि शायद थोड़ी दूर आगे बढ्ने पर होटल खाली मिल जाय। लेकिन ये क्या? सारे होटल बुक हो चुके थे। अब हमे बेचैनी होने लगी थी सारे भ्रम टूट चुके थे।
हमलोग ऑन-लाइन होटल देखने लगे OYO ओर Goibibo पर कुछ होटेलों में कमरे दिख रहे थे। अत: हमलोग उसकी तरफ दौड़ पड़े। लेकिन ये क्या? यहाँ तो होटल ही नहीं है। कस्टमर सर्विस वालों से बात किया तो वो गोल-मोल घुमाते रहे लेकिन होटल नहीं मिला। थक- हार कर हम एक होटल में पहुँचे जहाँ एक सिंगल कमरा बचा था जो चार हजार में मिल रहा था। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, अत: हमलोग उसी कमरे में रुकने का निर्णय कर लिया। होटल ढूंढने के क्रम में हमलोग मानसिक और शारीरिक रूप से काफी थक चुके थे अत: खाना खा कर जल्दी ही सो गए।
सुबह जल्दी उठकर तैयार होने लेगे। ठंड काफी अधिक हो चुकी थी। बाहर जाकर देखा तो घना कुहरा लगा था । दो-तीन मीटर से अधिक दूरी तक दिखाई नहीं दे रहा था। अत: हमने थोड़ी देरी से होटल से निकलने का मन बनाया । अब तक हमलोग माउंट आबु में स्थित आकर्षक स्थलों के बारे में बाते करते रहे।
माउंट आबु राजस्थान का एक मात्र हिल स्टेशन है। यह गुजरात के नजदीक है अत: यहाँ गुजरती लोगों को बहुलता से देखा जा सकता है। यहाँ नक्की झील, दिलवाड़ा का जैन मंदिर, ब्रम्हकुमारी प्रजापति का आश्रम, माउंट आबु शिखर और Bio-diversity Park भी है।
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| Bio-diversity Park |
मौसम का थोड़ा साफ होने पर सड़कों पर हलचल दिखने लगी । हमलोग भी तैयार होकर अपना सामान अपनी गाड़ी में रख लिया। सर्वप्रथम हमलोग झील देखने गए। कुहासे के मध्य झील के किनारे काफी भीड़-भाड़ थी। किनारे स्थित दुकानों पर पर चाय के लिए धक्का-मुक्की कर हमने अपने लिए चाय ले लिया। जुलाई में दिल्ली की गर्मी झेलकर यहाँ जनवरी जैसी ठंडक का आनंद प्राप्त कर रहा था। यधपि कुहरे के कारण झील की खुबसुरती अधिक नहीं दिखाई पद रही थी लेकिन जुलाई में झील के किनारे चाय के साथ ठंड का मजा भी अपने आप में अदभुद था।
थोड़ी देर झील के किनारे समय व्यतीत करने के बाद हमलोग अपने अगले पड़ाव दिलवाड़ा के जैन मंदिर की ओर बढ़ चले। जैन मंदिर के पास पहुँचने के बाद पता चला कि जैन मंदिर में थोड़ी देर बाद प्रवेश मिलेगा अत: हमलोग जैन मंदिर से थोड़ी दूर स्थित Bio-diversity Park देखने चले गए। यहाँ प्रति व्यक्ति 150 रु तथा गाड़ी का 250 रु फीस लग रहा था। फीस जमा कर हम जंगल के अंदर प्रवेश कर गए। थोड़ी दूर चलने के बाद एक स्थान पर पार्किंग बनी थी जहाँ हमलोगों ने अपनी गाड़ी पार्क की और जंगल में ट्रैकिंग का आनंद लेने लगे।
मौसम बदल रहा था। हल्की-हल्की हवा के साथ पानी की फुहारों ने ठंडक के साथ रूमानी बरसात का भी अहसास कराना आरम्भ कर दिया था। थोड़ी दूर चलने पर एक झील दिखाई दिया जिसके किनारे पर्यटकों के बैठने का स्थान बना हुआ था।
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| Bio-diversity Park में |
यहाँ अनेक गुजरती परिवार मस्ती कर रहे थे। थोड़ी दूर से कुछ युवाओं की टोली की मस्ती करने की आवाज़े आ रही थी लेकिन धुंध के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। लगातार आ रही आवाजों ने हमारे मन में कौतुहल पैदा कर दिया था अत: हमलोग भी उसी दिशा में चल पड़े। कटीली झड़ियों के बीच से गुजरते हुए हमे सीढ़ियाँ दिखाई दी अत: हमलोग समझ गये कि पास ही कोई ऊंची जगह पर युवा मस्ती कर रहे है। थोड़ा और पास जाने पर एक बड़ा सा चट्टान दिखाई दिखाई दिया जिसके उपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी थी। हम चारों दोस्त इस चट्टान पर चढ़ गए।
चट्टान के चारों तरफ लोहे की रेलिंग लगी थी ताकि आगंतुक सुरक्षित रूप से आनंद उठा सके। यहाँ हवाएं तेज लग रही थी फुहारों ने तो हमे भिगाने का ठेका ही ले रखा था। लेकिन फिर भी यहाँ इतनी शांति थी कि यहाँ से उतरने का मन ही नहीं हो रहा था। समय के अभाव के कारण मन को समझाया और हमलोग अपने अगले पड़ाव माउंट आबू शिखर कि ओर चल दिये।
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| Bio-diversity Park में चट्टान के ऊपर आनंद लेते हुए |
दिन की दोपहरी हो चुकी थी लेकिन धुंध अभी भी बना हुआ था। हमारी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। रास्ते में सड़क किनारे चट्टान पर युवा जोड़े मस्ती करते दिख रहे थे। कई स्थानो पर हमने भी गाड़ी रोक कर मस्ती की, फिर आगे बढ़ गए। हमलोग अब शिखर के करीब आ गये थे। यहाँ पार्किंग की व्यवस्था थी। अत: हमने अपनी गाड़ी पार्क कर शिखर की ओर बढ़ चले। शिखर तक जाने के लिए सीढ़ियाँ / रास्ते बने हुए है। लगभग शिखर तक रास्ते के दोनों तरफ खाने-पीने गिफ्ट, शृंगार आदि की दुकाने सजी हुई है जो इसकी सुंदरता को थोड़ा कम करती है।
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| माउंट आबू शिखर के पास |
शिखर पर एक मंदिर है और उसके थोड़ा ऊपर एक बड़ी सी चट्टान है। चट्टान के ठीक सामने एक खम्बे पर बड़ीसी घंटी टंगी है। यहाँ पहुँचने के बाद सारी थकान दूर हो गई। सामने घाटियों से आती हवाएं पानी की फुहारों के साथ मिलकर रोमांस और आध्यात्म का मिलाजुला प्रभाव उत्पन्न कर रही थी। यहाँ हम चारों दोस्त डट गए। आंखे बंद कर इस पल को अंतर्मन में बसा लेने की हसरत पूरा करने लगे।
हमलोग काफी भीग चुके थे अब ठंड हमे छोड़ने के मूड में नहीं था, शरीर कंपन आरंभ कर चुका था और समय अपनी सीमा बताने लगा था फिर हमे अभी दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर और ब्रम्ह्कुमारी प्रजापति का उपवन भी देखना था। अंतत: हम सारे अरमानो को समेटकर वापसी का रुख कर लिया। अब मौसम साफ होने लगा था। अत: हमरी गाड़ी की स्पीड बढ़ चुकी थी। हम जल्दी ही हम ब्रम्ह्कुमारी प्रजापति संस्था के उपवन में पहुँच गए।
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| शिखर के पास लगा घंटा |
यहाँ अनेक प्रकार के फूल, औषधी, झाड़ियाँ आदि लगी हुई थी। सबसे बड़ी बात यहाँ की आध्यात्मिक शांति थी जो एक विशेष प्रकार का आकर्षण उत्पन्न कर रही थी। यहाँ कुछ देर बैठकर समय बिताने का मन तो था लेकिन समयाभाव के कारण हम चाहकर भी ऐसा न कर सके। अब हमारा अंतिम लक्ष्य दिलवाड़ा का जैन मंदिर था। हम जल्दी ही मंदिर के प्रांगन में पहुँच गए।
दिलवाड़ा का जैन मंदिर अपने बेहतरीन नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ जैनियों के 24 तीर्थंकरों की मूर्तियाँ अलग-अलग मंदिरों में बनी हुई है। प्रत्येक मंदिर को विशेष प्रकार की नक्काशियों से सजाया गया है। इसकी सुंदरता देखकर अपने भारतीय विरासत पर गौरवाविन्वत महसूस करने लगा यहीं पास में ही एक अधुरा मंदिर भी है जो प्राचीन मंदिर से बड़ा किन्तु समान नक्कासी के रूप में बनाने का एक प्रयास दिखाता है। शायद निर्माता इसे पूरा न कर पाया हो।
खैर यहाँ हमने काफी समय बिताया, लेकिन अब वापसी का समय हो रहा था। अत: हमलोग सीधा एक रेस्टोरेन्ट में गए वहाँ कुछ खाना खाया और वापस दिल्ली की और निकल पड़े। इस वादे के साथ कि माउंट आबू पुन: पधारेंगे किसी दूसरे मौसम में।
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