प्रत्येक घुमक्कड़ के पास भटकता मन होता है जो उन्हे हमेश नए-नए स्थानो पर जाने को प्रेरित करता रहता है। अक्टूबर-2019 के प्रथम सप्ताह में दुर्गा पूजा के अवसर पर होने वाली छुट्टियों ने हमारे भटकते मन को घुमक्कड़ी के लिए बेचैन कर दिया। काफी सोच विचार करने के बाद हम चार दोस्त (मैं, अमित गुप्ता, विक्रम सिंह और अनुज कुमार वर्मा) खीर गंगा ट्रैक पर जाने को तैयार हो गए।
दिल्ली से मणिकर्ण तक जाने वाली हिमाचल रोडवेज में हम चारों की टिकट बुक हो गई। हमारी योजना 4 अक्टूबर की शाम को दिल्ली से निकलकर 9 अक्टूबर 2019 तक वापस दिल्ली आ जाना था। चार अक्टूवर सुबह हम अपनी पूरी तैयारी के साथ ऑफिस गए क्योंकि हमे कार्यालय से निकलकर सीधा बस पकड़ना था। लेकिन एंड वक्त पर विक्रम सिंह जी को कुछ अपरिहार्य कारणों से यात्रा रद्द करनी पड़ी। अत: शाम की गाड़ी में हम तीन मित्र ही यात्रा आरंभ कर रहे थे। विक्रम जी के ना आने का दुख तो था लेकिन "घुमक्कड़ी किस्मत से मिलती है"ये सोच कर हम अपनी यात्रा की रूप-रेखा बनाने में जुट गए।
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| Kheer Ganga |
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| पार्वती घाटी |
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| पार्वती नदी |
लगभग 1-1.5 घंटे में हम बरसैणी गाँव पहुँच गए। हाथ-मुह
धोकर कुछ खाना खाया और आगे कि रणनीति पर विचार करने लगे। यहाँ से हमारे पास तीन
विकल्प थे। प्रथम, बरसैणी गाँव में रात्री विश्राम किया जाय । दितीय, अभी से ही खीर गंगा ट्रैकिंग आरंभ कर दी जाय।
तृतीय,
यहाँ से 2-3 कि.मी. दूर तोष गाँव चला जाय और वहाँ रात्रि विश्राम किया जाय।
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| खीर गंगा ट्रैक |
हमने तीसरे विकल्प को चुना और तोष गाँव जाने को
तैयार हो गए। बरसैणी से तोष जाने के दो मार्ग है। एक सड़क मार्ग का अनुसरण किया जाय
जो 3-4 कि.मी. का है। दूसरा ट्रैकिंग मार्ग जो 2-2.5 कि.मी. का है। स्थानीय लोग
इसी मार्ग का उपयोग करते है। हमने भी ट्रैकिंग मार्ग को ही चुना। यह ट्रैकिंग
मार्ग आरंभ में लगभग 300-400 मीटर खड़ी चढ़ाई है जहां सावधानी पूर्वक पैर के साथ साथ
हाथ का भी प्रयोग करना पड़ता है। उसके बाद सीधा रास्ता है । यहाँ से सेब के बाग
आरंभ हो जाते है।
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| सेब का तोड़ते हुए |
सेब के बागों के बीच से गुजरते हुए जब हमने फलों से लदे पेड़ों को देखा तो फलों को तोड़कर खाने कि इच्छा होने लगी। लेकिन चोरी नहीं करने की प्रेरणा ने इस इच्छा पर विजय प्राप्त कर लिया। कुछ दूर चलने के बाद पुन: बारिश होने लगी अत: हमलोगों ने दौड़कर एक झोपड़ी में शरण ले लिया। झोपड़ी में कोई नहीं था लेकिन हमलोगों ने अंदाजा लगा लिया था कि इसमे सेब के बागों की रखवाली करनेवाले लोग रहते होंगे। थोडी देर में एक व्यक्ति और झोपड़ी में आ गया। यह स्थानीय व्यक्ति था जो बागों कि रखवाली कर रहा था। हमने उससे रास्ता पूछा और कुछ सेब तोड़ने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने के बाद हमने पाँच-छ सेब तोड़ लिए। पेड़ से तोड़कर सेब खाने का यह मेरा पहला अनुभव था। सेब भी रस-भरे और मीठे थे। बारिश थम गई थी। अब हम तेजी से तोष की ओर बढ़ गए। एक घंटे से भी कम समय मे हमलोग तोष पहुँच गए थे।
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| सेब का बाग |
About Tosh
‘तोष’
हिमालय की गोद में बसा एक खुबसूरत गाँव है। इसके तीनों तरफ बर्फ से लदी चोंटीयां
इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देती है। इस गाँव के पास से पार्वती नदी बहती है। यह गाँव
मनाली की तरह विकसित तो नहीं लेकिन
खूबसूरती में उससे कम भी नहीं है। यहाँ के सस्ते होटल (500/-प्रति रात) में बैठकर
भी हिमालय की सुंदरता का आनंद लिया जा सकता है। यहाँ के लोग बड़े मेहनती और अपनी
संस्कृति के प्रति सजग है। यहाँ आना भी काफी आसान है मणिकरण से 20 Km,
कुल्लू से 60-70 Km तथा दिल्ली से 600 Km
है।
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| तोष गाँव का प्रवेश पुल |
जब हमलोग तोष पहुंचे तो शाम ढल रही थी। गाँव के
चरवाहे अपनी गाय-बकरी के साथ अपने घरों की ओर लौट रहे थे। उनके पीछे हमलोग भी गाँव
में प्रवेश कर गए। सबसे पहले हमे रहने का ठिकाना ढूँढना था। अत: हमने जल्दी ही एक
अच्छा सा होटल ढूंढ लिया । यहाँ से बर्फ से लदे पहाड़ों के साथ घने जंगलों का भी
दर्शन हो रहा था जो मन को शांति प्रदान कर रहा था ठंड अधिक बढ़ गई थी अत: हमलोग
कमरे में पहुँचकर ठंड से बचने के लिए कंबल में घुस गए।
रात के लगभग 9 बजे रहे थे, अब
हमे भूख लगने लगी थी अत: हमने होटल वाले को खाने का ऑर्डर दे दिया और गाँव घूमने
निकल पड़े। गाँव की पतली गलियों से गुजरते हुए हमलोग गाँव के बीच स्थित मंदिर के
पास पहुँचे जहाँ स्थानीय लोग पारंपरिक वाध यंत्र बजा रहे थे और देवता की वन्दना कर
रहे थे। कुछ देर में समझ आया कि यहाँ बकरे कि बलि दी जा रही थी। यहाँ से वापसी का
समय हो रहा था क्योंकि हमने होटल में खाने का ऑर्डर दे रखा था। वापस होटल पहुँचकर
हमलोग खाना खाने गए। होटल वाले ने अपनी पूरी व्यवस्था टॉप फ्लोर पर बना रखी थी
जहाँ बर्फीली चोटियों से टकराकर ठंडी हवा हमारा स्वागत कर रही थी। आरंभ मे ठंडी
हवा रोमांटिक लग रही थी लेकिन डिनर समाप्त करते-करते हमलोगों के हाथों ने काम करना
बंद कर दिया और होठों ने साथ नहीं देने का मन बना लिया। ठंड से ठिठुरते हुए हमलोग
बिना पानी पिए अपने कमरे कि ओर भागे। कमरे के अंदर कुछ राहत महसूस हुई तब हमने
पानी पी। अब हमे सोना था क्योंकि कल सुबह हमे खीर गंगा ट्रैक आरंभ करना था।
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खूबसूरत सुबह |
6 अक्टूबर कि सुबह हम जल्दी उठे और तैयार होने लगे।
आसमान में हल्के बादल थे अत: सुबह के 7 बजे भी हल्की-हल्की धुंध दिखाई दे रही थी।
लेकिन फिर भी हम 8 बजे होटल से निकल पड़े। यहाँ से हमे वापस बरसैणी जाना था जहाँ से
खीर गंगा ट्रैक आरंभ होती है। हमलोगो ने पुन: ट्रैकिंग रूट अपनाया और सेब के बागों
से होते हुए बरसैणी कि ओर चल दिए। रास्ते में एक पेड़ के नीचे कुछ सेब गिरे पड़े थे
अत: हमने उठा लिया कुछ दूरी पर पेड़ पर लगे पके सेबों ने हमार मन डिगा दिया और फिर
10-12 सेब हमारी झेली में आ गए। इन सेबों से सुबह का नाश्ता हो गया और हम जल्दी ही
बरसैणी पहुँच गए।
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| बरसैणी गाँव |
एक ढाबे पर हमने कुछ खाना खाया और रास्ते के लिए पराठे
पैक करा लिए। अपनी बैग उसी ढाबे के पास किराए पर रखकर (20रु प्रति बैग/प्रति दिन) हम
खीर गंगा ट्रैक कि ओर बढ़ चले।
खीर गंगा ट्रैक बरसैणी गाँव के पास स्थित पार्वती
हाइड्रो पवार प्रोजेक्ट के पास से आरंभ होता है। खीर गंगा ट्रैक के दो रूट हैं। एक
रूट गाँव से होकर जाती है जो लगभग 9-10 KM है। यह
आरंभ के 5-6 Km तक आसान है जबकि अंतिम 2-3 Km खड़ी
चढ़ाई है। दूसरा रूट पार्वती घाटी वन संरक्षित क्षेत्र से जाता है यह 11 KM है, जो
लगभग पूरा रूट जंगलों से होकर गुजरता है। यहाँ धूप नहीं लगती है लेकिन कुछ स्थानो
पर खतरनाक मोड और झरने हैं जो यात्रा को एडवेंचरस बना देते है। इस रूट पर जाने के
लिए शुल्क का भुगतान करना पड़ता है।
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| खीर गंगा ट्रैक का आरंभ |
हमने अपनी यात्रा दोपहरी में आरंभ की थी अत: हमारे
लिए संरक्षित वन क्षेत्र का रास्ता अधिक सुविधाजनक था। पार्वती पवार प्रोजेक्ट के
डैम को पार करते ही हमारी खीर गंगा कि यात्रा आरंभ हो गई थी। आरंभिक चढ़ाई में ही
हमलोगों की सांसे फूलने लगी थी। लेकिन हमने एक दूसरे को हिम्मत दी और धीरे-धीरे
आगे बढ्ने लगे।
पार्वती नदी के किनारे-किनारे पहाड़ पर हम तीनों
दोस्त आगे बढ़ रहे थे। हरे-भरे लंबे पेड़ों के बीच से कभी-कभी धूप भी हमे चुपके से
देख लिया करता था। बरसात में कई पेड़ रास्ते पर गिर गए थे जिनके अवशेष अभी भी दिखाई
दे रहे थे। कुछ स्थानो पर झरनों ने रास्ते को बहा दिया था वहाँ लकड़ी के पुल बना
दिए गए थे। एक दो स्थानों पर रास्ता इतना कठिन था की लोगों को पार करने में कठिनाई
आ रही थी। यहाँ मेरे बचपन में पहाड़ पर दौड़कर चढ़ने-उतरने की कला काम आई। मैं पहले
पार हो गया और सहयात्रियों (लगभग 20-25) को हाथ पकड़कर ऊपर खिचा। दिन के 2 बज गए थे थकान होने लगी थी लेकिन अभी
40% ट्रैकिंग बाकि था। हमने एक पेड़ के नीचे थोड़ी देर आराम किया कुछ खाया और आगे
बढ्ने लगे। मेरे दोनों मित्र ट्रैकिंग कम करते है अत: वे हमसे पीछे छुट जा रहे थे, हमे
आगे बढ़कर रुकना पड़ता था। फिर मैंने एक आइडिया पर विचार किया कि मैं अनुज का हाथ
पकड़कर उसे अपने साथ ले चलूँगा। लगभग दो Km साथ चलने के बाद अनुज का गुस्सा सातवे आसमान पर
चढ़ गया। उसकी थकान और मन स्थिति को देखकर मैंने भी हथियार डाल दिया क्योंकि अमित
जी की हालत भी कोई अलग नहीं लग रही थी।
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| आराम करते हुए |
हम यात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे यहाँ से खीर गंगा
कैंप 2 Km था। लेकिन शाम ढाल रही थी और हमे उपर पहुँचकर कैंप
भी बुक करना था। अत: हमने निर्णय किया कि अनुज और अमित आराम से चढ़ाई करेंगे और मै
तेजी से कैंप के पास पहुंचर कैंप बुक कर लूँगा। इसके बाद मै तेजी से बिना रुके आगे
बढ्ने लगा घने जंगलों के बीच बने रस्तों से होता हुआ, मैं
4:30 बजे खीर गंगा पहुँच गया। यहाँ अनेक कैंप लगे थे। मैंने दो तीन कैंपों में
रहने के लिए बात की तो मुझे एहसास हो गया कि यहाँ कैंप सस्ते में आराम से मिल सकते
है। अत: अब मैं अपने मित्रों का इंतजार करने लगा। इसी बीच कुछ लोगों को मैंने खीर
गंगा के गर्म कुंड कि ओर जाते देखा तो, मैंने भी सोचा कि क्यों न गर्म कुंड में
स्नान करते हुए इंतजार किया जाय। फिर क्या था कुछ मिनट में मैं गर्म कुण्ड में था
और 13000 फीट की ऊँचाई पर ‘स्टीम बाथ’ का
अनाद प्राप्त कर रहा था। 30-40 मिनट बाद मेरे मित्र भी आ गए और मैं जल्दी से कपड़े
पहन कर उनके साथ हो लिया। कुण्ड के पास ही हमने एक टेंट किराए पर ले लिया (500रु)।
टेंट में कुछ देर आराम करने के बाद मित्रों के साथ मै पुन: कुण्ड में स्नान करने
चला गया।
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| खीर गंगा का गर्म कुण्ड |
About Khir Ganga
प्रचलित कथा के अनुसार भगवान शिव और पार्वती ने इस
स्थान पर वर्षो तक तपस्या की थी। स्थान का नाम कुमार कार्तिकेय से भी जुड़ा हुआ है।
कहा जाता है कि सतयुग में यहाँ से खीर बहा
करता था जिसे खाकर सभी जीव तृप्त होते थे। कलयुग के आगमन के साथ ही इसे पानी का
बना दिया गया ताकि झगड़ा न हो कुण्ड के पानि में सफेद रंग का पदार्थ मिला रहता है जिसे
स्थानीय लोग मलाई कहते है।
इन सबसे अलग 13000 फीट की ऊँचाई पर बर्फीली हवाओं
के बीच गर्म कुण्ड में स्थान करना एक अदभुद अनुभव होता है। यहाँ से मध्य हिमालय की
श्रेणियां देखी जा सकती है जो इसकी खुबसुरती को और अधिक बढ़ा देता है। इसके साथ ही
11 Km का
ट्रैंकिंग अनुभव भी “ FIT INDIA MOVEMENT ” की
याद दिला देता है।
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| खीर गंगा की सुबह |
रात में सभी टेंट में आग की व्यवस्था तो मजबूरी है
लेकिन तीव्र शोर के साथ संगीत स्थानीय जीवों के लिए हानिकारक होता है। लेकिन यहाँ
जाने वाले ट्रैकरों को तो बस अपनी मस्ती सूझती है। खैर रात अच्छी गुजरी लेकिन सुबह
जब उठा तो हल्की-हल्की बारिश हो रही थी जो जो हमारे माथे पर चिंता की लकीर खिच रही
थी। क्योंकि बारिश में पहाड़ से उतरना काफी खतरनाक होता है। लेकिन प्रकृति के सामने
हमलोग क्या कर सकते है। इस मौसम मे बारिश करने आए बादल जो पार्वती घाटी को ढक कर
खड़े थे बड़े अच्छे लग रहे थे । खैर बुन्दा-बान्दी के बीच ही जल्दी से फ्रेश होकर
कुण्ड में स्नान भी कर लिया और अपने टेन्ट में आकर बारिश रुकने का इंतजार करने
लगे। लगभग 10 बजे बारिश बंद हो गया, अत: हम अपने मित्रों के साथ नीचे उतरने लगे। बारिश
के कारण रास्ते पर थोड़ी फिसलन हो गई थी अत: हमे संभल कर चलना पड़ रहा था। लौटते समय
हमलोगों ने तय किया कि हम गाँव वाले रास्ते से उतरेंगे। इस रास्ते में 3 KM तक खड़ी
उतराई थी। मैंने अनुज का हाथ पकड़ कर उतरने की रणनीति बनाई जो सफल रही 3 KM की
उतराई हमने 1-1.5 घंटे में तय कर ली।
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| पार्वती नदी के किनारे |
अब हमलोग एक पुल पार कर पार्वती नदी के दूसरे
किनारे पर आ गए थे। रुद्रनाग होते हुए गाँव में प्रवेश कर गए। इस रास्ते खीर गंगा
जाने वाले अनेक यात्री मिल रहे थे। जो ट्रैक रूट, ट्रैकिंग की दूरी और चढ़ाई के बारे में पूछ
रहे थे। हमने भी उनका हौसला बढ़ाया और आगे बढ़ गए। लगभग 2 बजे हम वापस बरसैणी गाँव
पहुँच चुके थे। यहाँ हमने अपना बैग लिया और खाना खाया थकान तो हो रही थी लेकिन
वापस भी जाना था। यहाँ से कुल्लू जाने के लिए 4 बजे बस जाती है। काफी भीड़ थी, सवा चार
बज गए थे लेकिन तभी बस आ गई और हम जैसे-तैसे बस में सवार होकर मन में खीर गंगा की
यादों को संजोए वापस दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए।
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