घुम्मकड़ नव वर्ष के आगमन
के साथ अपनी यात्राओं की संभावित सूची बनाता है और उसे पूर्ण करने का भरसक प्रयास करता है। लेकिन कहते है न “कि घुम्मक्डी किस्मत से मिलती है”, ऐसा ही मेरे साथ
भी हुआ नव वर्ष 2019 के आगमन के साथ हमने भी हिमाचल या उत्तराखण्ड में स्नो
ट्रैकिंग करने का प्लान बनाया लेकिन कार्य की व्यस्तता में ऐसा उलझा कि जनवरी से
मार्च कब निकल गया पता ही नहीं चला। फिर किस्मत ने अप्रैल 2019 में घुम्मक्डी का मौका
दिया । बिना देर किए मैं और मेरे दो मित्र
(अमित एवं आकाश) डलहौजी हिमाचल प्रदेश घूमने निकाल पड़े।
हमलोग दैनकुंड बेस पॉइंट के नीचे आ चुके थे । बेहद थकान के बावजूद मन में जोश बना हुआ था, अब हमे यहाँ से काला टॉप की और प्रस्थान करना था। हम लोग टॅक्सी में बैठ गए और एक नए मंजिल की ओर चल दिए ।
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| डलहौजी |
दिल्ली से
डलहौजी जाने के लिए कई विकल्प उपलब्ध होते है। आप हिमाचल रोडवेज अथवा प्राइवेट बस
से सीधे डलहौजी पहुँच सकते है। अगर आप बस की यात्रा कम से कम करना चाहते हैं, तो रेल द्वारा
आप पठानकोट पहुँच सकते है।यहाँ निजी वाहन (कार/बाइक) से भी आसानी से पहुंचा जा सकता
है।
हमलोग दिल्ली
से पठानकोट के लिए पुरानी दिल्ली से ट्रेन में बैठ गए। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व
हमलोग पठानकोट पहुँच गए थे। रेलवे स्टेशन से बस अड्डे तक जाने के लिए ऑटो लिया।
ऑटो में बैठने की व्यवस्था तथा सवारी की संख्या दिल्ली में चलने वाले मिनी बस की
तरह थी अंतर सिर्फ इतना था कि मिनी बस के
चार चक्के होते है और ऑटो के तीन ही थे। ड्राइवर भी एक सामान्य पंजाबी की तरह खराब
सड़क पर भी गाड़ी तेजी से चलाकर बचते बचाते बस स्टैंड तक छोड़ दिया।
अब हमलोग
डलहौजी जाने वाली बस में सवार हो गए। पठानकोट से बस खुल चुकी थी लेकिन मेरे मन में
अधिक खुशी नहीं थी क्योंकि डलहौजी घूमने का आइडिया मेरा नहीं था अपितु मेरे मित्र
अमित गुप्ता का था। वस्तुत: मुझे बर्फ से लदे पहाड़ अधिक अच्छे लगते है और डलहौजी
के बारे में कहा जाता है कि यहाँ मार्च के बाद बर्फ नहीं दिखते क्योंकि इस समय
यहाँ ग्रीष्म ऋतु होती है।
मेरे मन में
अनेक तरह के विचार आ-जा रहे थे और दूसरी ओर बस अपनी रफ्तार पकड़ती जा रही थी।
पठानकोट शहर से बस आगे निकल चुकी थी लेकिन मै अभी भी अपने विचारो में उलझा हुआ था। अचानक आम के मांजर (आम का फूल) कि
खुशबु से सराबोर हवा के झोंकों ने मुझे आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में ला
दिया। खिड़की के बाहर देखा तो सड़क के दोनों किनारों पर लगे आम के पेड़ अपनी नव यौवन
की मादकता से पूरे वातावरण को मदहोश बना रहे थे। तब हमे स्मरण हुआ कि मार्च-अप्रैल
का महिना उष्णकटिबंधीय पर्णपाति वनो में फूलो के खिलने का समय होता है न केवल आम
अपितु अन्य पेड़-पौधे, झांडियों पर भी फूल खिले दिख रहे थे। अब शिवालिक हिमालय कि
घाटियां दिखने लगी थी जैसे-जैसे हम डलहौजी के नजदीक पहुँचते जा रहे थे चेहरे पर
खुशी बढ़ती जा रही थी। सड़क के किनारे दोनों ओर जंगल भी घना होता जा रहा था। वस्तुत:
पठानकोट के बाद ही पहाड़ी की चढ़ाई शुरू हो जाती है, और प्रकृतिक
सौंदर्य के दर्शन से आंखो को जहाँ सुकून मिलता है वही स्वच्छ हवाएं हिमालय की ठंडक
के साथ मिलकर घुमक्ड़ो की थकान को दूर कर देती है।
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| दैनकुंड पहाड़ की बर्फ से ढकी चोटियाँ |
अतत: हमलोग दोपहर
के पहले ही डलहौजी पहुँच गए। यहाँ का मौसम ठंडक से भरा था। अत: हुमलोगों ने बस से
उतरते ही अपना गर्म जैकट निकाल कर पहन लिया।
“डलहौजी एक छोटा शहर है जो पाँच पहाड़ियो से घिरा
हुआ है। यह मध्य हिमालय और लघु हिमालय के मध्य में स्थित है । यहाँ का मौसम
संतुलित है जो एक तरफ आपको हिल स्टेशन की खुबसुरती का एहसास दिलाता है तो दूसरी
तरफ चरम मौसमी परिस्थितियो से भी बचाता है। इसका नाम लार्ड डलहौजी एक
ब्रिटिश गवर्नर जनरल के नाम पर पड़ा है। डलहौजी के काल में ब्रिटिश भारत का सेना
मुख्यालय यहाँ बनाया गया था। यधपि अब सेना का मुख्यालय दिल्ली को बना दिया गया है
लेकिन डलहौजी में भी इसके साक्ष्य देखे जा सकते है। डलहौजी में दो प्रमुख चौक है।
गांधी चौक और सुभाष चौक, कहा जाता है कि सुभाष चन्द्र बोस औपनिवेधिक कल में यहाँ
रहे थे। गांधी चौक अधिक विकसित है क्योंकि यहाँ खजियार, चंबा, दैनकुण्ड व
अनेक स्थानो के लिए बस / टैक्सी मिलता है मुख्य बाजार भी यहीं है। लेकिन आपको टैक्सी
लेनी हो तो एक बार सुभाष चौक की और भी चले जाए क्योंकि यहाँ आपको सस्ती दर पर
टैक्सी मिल सकती है। डलहौजी में दो चर्च है एक सुभाष चौक के पास तो दूसरा गांधी
चौक के पास। ये चर्च इसकी औपनिवेधिक विरासत को स्पष्ट करते है।
डलहौजी अपने
अच्छे बोर्डिंग स्कूलो के लिए भी जाना जाता है। यहाँ डलहौजी पब्लिक स्कूल, डलहौजी हील
टॉप स्कूल अधिक प्रसिद्ध है जहां न केवल पूरे भारत से बच्चे पढ़ने आते
हैं अपितु NRI (विदेशो से बसे भारतीय) के बच्चे भी आते हैं। मशहूर फिल्म “तारे
जमीन पर” का पेंटिंग वाला द्रश्य भी यहीं शूट किया गया था। यहाँ के घने वन जिसमे
पाइन, ओक, स्फ़्रूस, आदि के पेड़ों की बहुलता इसे और अधिक मनमोहक बनती है।
हमलोगों ने
पहले से ही होटल बुक कर रखा था अत: हम जल्द ही होटल पहुँच गए और तैयार होकर घूमने
का प्लान बनाने लगे। डलहौजी लोकल मे चर्च, तिब्बती मार्केट,सात धारा, पंचपूला जल
प्रपात तथा स्थानीय मार्केट है ,यहाँ आप प्रथम
दिन मे घूम सकते है । इन सभी स्थानो में सबसे अच्छा पंचपुला लगा। यधपि यहां छोटा
सा जल प्रपात है लेकिन फिर भी यहां बच्चो के लिए वाटर पार्क, युवाओं के
लिए एडवेंचेर्स एक्टिविटी के साथ खाने पीने की अच्छी व्यवस्था मिल जाती है।
डलहौजी की
यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक आप खजियार, दैनकुण्ड और
काला टॉप वाइल्ड लाइफ उधान की यात्रा नहीं कर लेते। डलहौजी के पास ही चमेरा लेक भी
है। इस सभी जगह जाने के लिए आपको अपनी गाड़ी अथवा टॅक्सी लेनी पड़ती है। यदि टॅक्सी
लेनी हो तो शाम में ही बुक कर ले ताकि सुबह जल्दी निकला जा सके। हमने भी ऐसा ही
किया और सुबह-सुबह दैनकुण्ड के लिए निकल पड़े। दैनकुंड नाम कोई झरना अथवा जल
स्रोत का भान कराता है लेकिन ये एक पर्वत शिखर है जहां आपको ट्रैकिंग कर पहुंचना
होता है। हम तीनों मित्र टैक्सी में सवार होकर प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने हुए
जा रहे थे साथ ही ड्राइवर से डलहौजी में रहने वाले स्थानीय लोगो के जीवन के बारे
में भी जानकारी प्राप्त कर रहे थे।
सड़क के किनारे
पर बड़े-बड़े पेड़ तो दूसरी तरफ खाई हिमालय क्षेत्र की विशेषता है, लेकिन जब खाई
की दूसरी तरफ दूर स्थित हिमालय के बर्फ से ढकी चोटियाँ दिखती है तो खाई की ओर कौन देखता है। हमारी गाड़ी दैनकुण्ड की और बढ़ रही थी
और हमलोग बाहर सौंदर्य से मंत्रमुग्ध हो रहे थे। अब पेड़ो के साथ-साथ सड़क किनारे बर्फ भी दिखने लगे थे। जल्द ही हम
दैनकुण्ड के बेस पॉइंट पर पहुंच गए। गाड़ी वाले ने गाड़ी पार्क कर दी और हमे वापसी
में यही मिलने को बोल कर अपने अन्य मित्रों के पास चला गया।
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| दैनकुंड ट्रैकिंग रूट |
अब यहाँ से
3.5-4 KM की छोटी चढ़ाई हमे करनी थी। हम
तीनों भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ चले। लगभग एक किलो मीटर के बाद ही हमे पेड़ की छावों
ने अलविदा कह दिया। अब खुले पहाड़ थे जहां
से पूरा डलहौजी देखा जा सकता था। हमारे आगे-आगे दक्षिण भारत से आई बच्चो की टोली भी चल रही थी जिसमे कुछ बच्चे सबसे आगे तो कुछ बच्चे बहुत
पीछे थे। पीछे रह गए बच्चो का हौसला बढ़ाने के लिए उनके PT मास्टर लगातार
प्रयास कर रहे थे। हमलोग तेजी से उन बच्चो को पीछे छोड़ दिया और आगे निकाल गए। आगे
रास्ते पर बर्फ पड़ी थी जो स्नो ट्रैकिंग का आनंद भी दे रही थी, विशेषकर मेरे
लिए तो यह टूटे सपने के पुन: जुडने जैसा था क्योंकि अप्रैल में डलहौजी जैसे
अपेक्षाकृत आसान ट्रैकिंग पर बर्फ मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
जैसे-जैसे हम
ऊपर चढ़ रहे थे हवाएँ तेज होती जा रही थी और मौसम बदलने लगा था। आसमान में बादल दिखाई
देने लगा था और सूरज उसके पीछे छुप गया था। अब ट्रैकिंग मे और अधिक आनंद आ रहा था ।
पहाड़ी कुत्ते बर्फ पर उछाल-कूद कर अटखेलिया कर रहे थे जो प्रकृति के साथ उसके
आत्मीय संबंध को प्रकट कर रहे थे।
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| दैनकुंड चोटी पर माता का मंदिर |
दैनकुण्ड के
शिखर पर माता का मंदिर है जहां स्थानीय लोग मन्नत मांगते है और मन्नत पूरी होने पर
भंडारा कराते है । यहाँ छोटी-छोटी 3-4 दुकाने भी है जो प्रसाद एवं स्नैक्स,पानी आदि उपलब्ध
कराते है। हमलोग मंदिर पहुंच गए और माँ का
आशीर्वाद लिया। बाहर एक व्यक्ति भंडारा में छोले-भटूरे बांट रहा था। हमने भी उसका
स्वाद चखा “ मजा आ गया ” । कुछ लोग मंदिर
से ऊपर भी चढाई करते है जबकि अन्य वही से वापस हो जाते हैं । हमने उपर और चढ़ाई करने
का मन बनाया । ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ को देखर अमीत भाई का मन तैयार नहीं हो रहा था
लेकिंन आग्रह करने के बाद वो मान गए। हमलोग आगे चढाई करने लगे।
यहाँ रास्ते के
साथ-साथ ढालान पर भी बर्फ जमी हुई थी जो स्नो ट्रैंकिंग की कठिनाई और आनंद दोनों
प्रदान कर रही थी। हमलोग पहली और फिर दूसरी चोटी तक पहुंच गए थे लेकिन हवाएं तेज
हो गई थी और बादल पूरी चोटी को अपनी आगोश में ले रहा था। घाटियों से आते बादल के
झुंड बड़े प्यारे लग रहे थे कुछ देर में ही हमे बदलो ने घेर लिया बदलो और ठंडी
हवाओं के संगम ने हमे स्वर्गलोक की यात्रा का एहसास करा दिया। दिल से निकाल रहा था कि किसी
शंहशाह की तरह हम भी कह दे कि “ पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यही है यही है यही है
” वस्तुतु: कहा जाता है कि भारत में डलहौजी “ धुंध का शहर ” के नाम प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ वर्ष
भर धुंध रहता है। काफी देर यहाँ व्यतीत
करने के बाद हम भारी मन से नीचे कि ओर बढ्ने लगे। नीचे उतरते समय हमे पुन: बच्चो कि
टोली मिल गई जो अब अपनी मंजिल तक पहुंच कर बर्फ के साथ मस्ती कर रहे थे । लौटते
समय एक स्थान पर एक स्थानीय व्यक्ति चाय बना रहा था उसके साथ उसकी छोटी बच्ची भी
थी जो उतनी ठंड में भी कुछ पैसे अर्जित करने में अपने पिता की मदद कर रही थी।
इसलिए कहा जाता है कि पहाड़ घूमने के लिए अधिक अच्छे लगते है, लेकिन यहाँ
जीवन-बसर करना काफी कठिन होता है।
क्रमश:॰..............................................................................
काला टॉप एवं खजियार कि यात्रा अगले भाग में





Accha likha hai aapne , Continue rakhiye
ReplyDeleteThanks bro
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteBahut badhiya bhai
ReplyDeleteशानदार वर्णन
ReplyDeleteधन्यवाद.
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