Monday, 9 September 2019

Khajjiar. डलहौजी दैनकुण्ड-खजियार-कालाटॉप यात्रा भाग-II


         अबहमलोग काला टॉप उधान की ओर बढ़ रहे थे। दैनकुण्ड बेस पॉइंट से काला टॉप 8 Km है। लेकिन पहाड़ी रास्तो के कारण हमे वहाँ पहुँचने में एक घंटा लग गया।
काला टॉप 


काला टॉप एक वाइल्ड लाइफ सेंचुरी है। यह चम्बा जिला में पड़ता है। यह लगभग 20 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ काला भालू सहित अनेक पशु पक्षी पाए जाते हैं। यहाँ वन विभाग का गेस्ट हाउस भी है। शंकुधारी वन तथा ओक के वृक्ष बड़े पैमाने पर हैं। इसके थोडी दूर से रावी नदी गुजरती है, जो इसकी सुंदरता को और अधिक बढ़ा देती है।
काला टॉप उधान के अंदर गाड़ी ले जाने की फीस 250/- रूपये है, जो गेस्ट हाउस तक जाती है। यदि आपके पास समय कम है तो गाड़ी से जा सकते है लेकिन यदि आप ट्रेकिंग और प्रकृतिक एडवेंचर का आनंद लेना चाहते है, तो आप इस छोटी सी ट्रेकिंग (3 Km) को प्राथमिकता दे, क्योंकि गाड़ी से गेस्ट हाउस तक पहुँचने में मात्र 15 मिनट लगते है  और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद भी जल्द खत्म हो जाता है”। गेस्ट हाउस तक पहुँचने के बाद यहाँ के रोमांटिक मौसम का आनंद लिया जा सकता है। बड़े-बड़े पेड़ों के बीच बना पार्क में धुंध काफी अधिक था। हल्की-हल्की बारिश मे मौसम रोमांटिक होने लगा । हमलोग पार्क मे रखे बेंच पर बैठ गए और प्रकृति के साथ अपनी भावनाओं को जोड़ने का प्रयास करने लगे। ठंड और बारिश ने हमे सुकून तो पहुंचाया लेकिन सिंगल होने का दर्द भी बढ़ा दिया।
काला टॉप 


खैर अब बारिश अधिक होने लगी थी। अत: हमलोग पुन: अपनी गाड़ी में बैठ गए और खजियार के लिए निकाल पड़े। यहाँ से खजियार लगभग 22 Km है। खजियार पहुँचने में हमे 1.5 घंटे लगे। हमलोगो ने खजियार में ही रुकने का प्लान बनाया था और होटल बुक करा लिया था। अत: हम सीधे होटल पहुँच गए और कुछ देर आराम करने के बाद खजियार की शाम का लुफ्त उठाने को तैयार हो गए।
खजियार चारो तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ है, शंकुधारी वृक्ष के बड़े-बड़े पेड़ों से ढके होने के कारण यह  “हरा कटोरा (Green Bowl) जैसा दिखता है। यहाँ रहने के लिए 8-10 होटल बने हुए है, जो काफी महंगे है। यहाँ का रूमानी मौसम और प्राकृतिक सौंदर्य काफी आकर्षक है।
खजियार 


शाम जैसे-जैसे ढल रही थी खजियार के चारो ओर दूर स्थित बर्फ के पहाड़ भी अपना रंग बदलने लगे थे जो इसकी सुंदरता पर चार चाँद लगा रहे थे। ठंड बढ़ने लगी थी अत: हमलोग अपने होटल में आ गए। होटल वाले को खाना बनाने को बोल दिया। आधे घंटे में खाना बन गया और हमने खाना खा लिया। अब हमलोग अगले दिन की यात्रा और खजियार में पैराग्लाइडिंग करने का प्लान बनाने लगे। जल्द ही यह तय हो गया कि हम सुबह जल्दी उठ कर सूर्योदय देखेंगे और पैराग्लाइडिंग कर वापस डलहौजी तथा वहाँ से दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।
प्लान के अनुसार हमलोग सुबह जल्दी उठे और तैयार होकर सूर्योदय देखने निकल पड़े ।  पहाड़ों मे सूर्यास्त देखने का अपना अलग ही मजा है। सूर्य जैसे-जैसे अपनी लालिमा बिखेरता है वैसे-वैसे बर्फ से ढके पहाड़ भी अपना रंग बदलते है। कुछ ही देर में सूरज अपनी पूरी शक्ति से चमकने लगा था जो ठंड को भागने पर मजबूर कर रहा था।
अब हमलोग पैराग्लाइडिंग करने के लिए चल पड़े। यहाँ पैराग्लाइडिंग कराने वाले से मोल भाव करना उचित लगा। हमे बताया गया कि पैराग्लाइडिंग के लिए छोटी दूरी वाला 1500 रु तथा लंबी दूरी का 2500 रु लगेगा। लेकिन काफी मोल-भाव करने के बाद वह लंबी दूरी से पैराग्लाइडिंग कराने के लिए 1500/- मे ही तैयार हो गया। शायद इसलिए भी क्योंकि उनका यह ऑफ सीजन था अत: ग्राहको की संख्या सीमित थी।
खजियार 


मैं और आकाश ऑपरेटर के साथ टैक्सी में सवार हो गए और एक नए रोमांच का मजा लेने का इंतजार करने लगे। ऑपरेटर हमे काफी ऊंचाई पर स्थित गाँव के पास ले गया और वहाँ से लगभग 1 KM की चढ़ाई करने को बोला। वह स्वयं भी पैराशुट लेकर चढ़ाई करने लगा। हमे बताया गया कि ऊंचाई पर चढ़कर वहाँ से पैराशुट लेकर कुदना है। लगभग 40 मिनट कि चढ़ाई ने हमे थका दिया था लेकिन मन में उड़ने का रोमांच बना हुआ था जो थकान को मात दे रहा था।
अब यहाँ से हमे पैराशुट के साथ अपनी उड़ान भरनी थी। मन में डर और रोमांच का घमासान चल रहा था। पायलेट ने पैराशुट खोला और उसमे बंधे दो कुर्सीनुमा सरंचना से एक मुझे और एक स्वयं को बांध लिया। उसने हमे सख्त  हिदायत दी कि जब मैं कहूँ तब पैराशुट को लेकर दौड़ना है। दौड़ने में चूक हुई तो हम दोनों खाई में गिर सकते हैं। उसने जैसे ही दौड़ने को कहा मैं तेजी से दौड़ने लगा लेकिन ये क्या? न तो में तेजी से दौड़ पा रहा हूँ और न ही पैराशुट को खींच पा रहा हूँ। जब तक मैं कुछ समझ पाता  मैं हवा में उड़ रहा था।

  
हवा में इतनी ऊंचाई पर उड़ने का ये मेरा पहला अनुभव था। हृदय कि धड़कन बढ़ी हुई थी और मैं सब कुछ भूल-कर आसमान से पहाड़ और जंगलो को देख रहा था। एक पल तो यह भी विचार आया कि यदि यहाँ से गिरा तो किसी पेड़ पे अटकुंगा या सीधा पहाड़ पर टपकुंगा। नहीं ऐसा नहीं होगा क्योंकि पैराशुट के साथ हमारा पायलट भी तो है। ये सब मन में चल ही रहा था कि पायलट ने हवा में कलाबाजी दिखा दी। “एक पल तो ऐसा लग रहा था कि मैं पैराशुट के उपर और पैराशुट नीचे चला गया है। मुझे लगा कि अब तो मैं गया ”लेकिन पैराशुट को स्थिर करते हुए पायलट ने कहा कि जब तक कलाबाजी न करो मजा नहीं आता है। मैंने भी हुंकारी भरी लेकिन अंदर ही अंदर डर भी रहा था। 
तीन-चार बार कलाबाजी करने के बाद पायलट ने पैराशूट को नीचे लाना शुरू कर दिया जहां गाँव के छत पर एक छोटी बच्ची दिखी जो हमे देखकर बाय बाय” कर रही थी मैने भी चिल्ला कर उसे बाय बोल दिया। अब हम लैंडिंग करने वाले थे अत: पायलट ने हमे सलाह दिया कि अपना पैर उपर कर लेना नहीं तो पैर टूट सकता है और कमर में दर्द हो सकता है। मैंने वैसा ही किया और हमारी लैंडिंग आसानी से हो गई। 8-10 मिनट कि उड़ान बेहद रोमांचक भरी रही। वहाँ से हमे टैक्सी में बिठाकर खजियार छोड़ दिया गया जहां अमित जी हमारा इंतजार कर रहे थे।
अब हमे यहाँ से डलहौजी जाना था जहाँ से हमे दिल्ली के लिए बस लेनी थी। खजियार से डलहौजी जाने के लिए बस 10:00 बजे से 1:00 बजे और 4:00 बजे मिलती है, चूंकि हमे डलहौजी से 3:00 बजे के आस-पास बस पकड़नी थी अत: हमलोग टैक्सी से ही डलहौजी आ गए और वहाँ से रोमांचक एवं यादगार अनुभव लिए वापस दिल्ली की बस में सवार हो गए। अगले दिन सुबह-सुबह हम एक खुबसूरत सफर समाप्त कर दिल्ली पहुँच गए।
संबन्धित जानकारी:-  
      डलहौजी-खजियार-दैनकुण्ड-कालाटॉप घूमने के लिए बेस पॉइंट डलहौजी को बनाया जा सकता है। प्रथम दिन डलहौजी लोकल घूमे। दूसरे दिन दैनकुण्ड और कालाटॉप तथा तीसरा दिन खजियार घूम कर शाम को वापसी कर सकते है।
यदि आपके पास केवल दो दिन ही है तो आप पहले दिन में सुबह जल्दी उठकर कालाटॉप और दैनकुण्ड कर ले और शाम को डलहौजी लोकल घूम सकते है। तथा दूसरे दिन खजियार में पूरा दिन बिता सकते है।
कब जाएं:-
      डलहौजी वर्ष भर जाने लायक है लेकिन फिर भी यहाँ मई से दिसम्बर में लोग जाना अधिक पसंद करते है। जनवरी से मार्च तक बर्फ देखने भी जाया जा सकता है।

                              समाप्त

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