घुमक्कड़ी
में संयोग का बड़ा महत्व होता है। समय, पैसा, गाड़ी आदि सुविधाओं की उपलब्धता होने के
बावजूद घुमक्कड़ी मुश्किल से ही हो पाती है,क्योकि संयोग नहीं बन पाता। शायद इसीलिए
कहते है कि “घुमक्कड़ी किस्मत से मिलती है”। एक ऐसा ही संयोग जुलाई 2019 में
उदयपुर एवं माउंट-आबू जाने का बना।
मैं और
मेरे तीन दोस्तों (विक्रम सिंह, अमित गुप्ता और अंशु सिंह) ने तीन दिनों का ट्रिप बनाया। प्लान के
अनुसार हमे गुरुवार शाम को अपनी गाड़ी से दिल्ली से निकलना था और सोमवार की सुबह वापस दिल्ली पहुँच जाना था। हमारे पास कुल
तीन दिन थे जिसमे हमने दो दिन उदयपुर में और एक दिन माउंट आबू में घूमने का निर्णय
किया।
तय समय
के अनुसार हमलोग गुरुवार की शाम को विक्रम जी की गाड़ी से उदयपुर की ओर निकल पड़े।
शाम में दिल्ली की पकाऊ ट्रैफिक जाम का सामना करते हुए “हमने दिल्ली जयपुर हाइवे
पकड़ लिया ”। मानेसर पार करते-करते रात 10 बज
चुके थे। अत: हम डिनर करने के लिए मानेसर से थोड़ी दूरी पर स्थित “मन्नत ढाबा” पर रुके। यहाँ का पराठा काफी प्रसिद्ध है। हमने पनीर पराठे खाये जो बेहद
स्वादिष्ट थे। कुछ देर आराम करने के बाद हमलोग उदयपुर के लिए चल पड़े। अपने तीनों
दोस्तों के साथ बात करते-करते रात का अंधेरा कब सुबह के उजाले में परिणत हो गया
पता ही नहीं चला। सूरज के निकलने से पहले ही हमलोग झीलों की नगरी उदयपुर
पहुँच चुके थे। हमलोगों ने एक अच्छी जगह पर होटल ले लिया और आराम करने लगे।
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| पिछौला झील के बीच होटल |
उदयपुर
अपने सुंदर-सुंदर झीलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पिछौला झील, फतेह
सागर झील के अतिरिक्त अनेक छोटी-बड़ी झीले है। अरावली श्रेणी की पहाड़ियों के
बीच बसा यह नगर बेहतरीन मौसम, हरियाली के साथ अपनी ऐतिहासिक संस्कृति के लिए भी प्रसिद्ध रहा है, जिसके
अवशेष यहां आज भी देखे जा सकते हैं।
थोड़ी देर
आराम करने के बाद तैयार होकर हमलोग उदयपुर दर्शन को निकल पड़े। सर्वप्रथम हमने फतेह
सागर झील का चक्कर लगाया। बारिश कम होने की वजह से यह अभी पूरा भरा हुआ नहीं था।
लेकिन फिर भी इसके चारो ओर हरे-भरे पहाड़ तथा इसके बीच में एक छोटा सा उधान इसकी
सुंदरता में चार चांद लगा रहा था। इसके चारो ओर अच्छी सड़क बनी हुई है। नगर के लोग
सुबह और शाम को यहां टहलने आते है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ अदभुत शांति प्रेमी
जोड़ो को यहां आकर्षित करता है। अनेक जोड़े यहाँ आपस में ठिठोलियाँ करते नजर आए। खैर
अब हमे अपने अगले पड़ाव की ओर जाना था। अत: अपनी भावनाओं को समेटकर हम अपनी गाड़ी
में आकर बैठ गए।
हमारा
अगला पड़ाव था सिटी पैलेस एवं पिछौला झील जो साथ ही लगा हुआ है। सिटी पैलेस
मेवाड़ राज्य की समृद्धि और शान को व्यक्त करता है। इसके पीछे पिछौला झील है। यहाँ
पर्यटको के लिए बोटिंग की सुविधा भी है। सिटी पैलेस तीन तरफ से पहाड़ी एवं एक तरफ
से झील से घिरा हुआ है। जो इसकी सुरक्षा के साथ सुंदरता को भी बढाता है।
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| सिटी पैलेस |
सर्वप्रथम
हमलोग सिटी पैलेस घूमे, उसके बाद पिछौला झील में बोटिंग किया। झील के बीच में एक होटल बनाया
गया है जहां तक बोट के सहारे पहुंचा जाता है। झील के बीच से सिटी पैलेस बेहद खूबसूरत
लग रहा था। यांत्रिक बोट की स्पीड भी रोमांच का अनुभव करा रहा था। लगभग दो घंटे
यहाँ व्यतीत करने के बाद हमलोग जंगल सफारी की ओर चल पड़े।
सिटी
पैलेस से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर वन विभाग का एक उधान है जहाँ घुमा जा सकता
है। यहां नाममात्र की फीस ली जाती है। फीस चुका कर हमलोग जंगल में प्रवेश कर गए।
यहां अनेक प्रकार के पक्षी दिखाई दे रहे थे लेकिन कोई खतरनाक पशु नहीं था। पर्यटको
के लिए यहां झूले लगे थे जिन्हे देखकर हमारे मित्रों के अंदर का बचपना जाग उठा और
फिर “सावन के झूलों ने मुझको बुलाया” जैसा माहौल बन गया। थोड़ी देर बाद
हमलोग जंगल में और आगे बढ्ने लगे। हमलोगों के अलावा इस जंगल में एक फैमिली और दिखी
जो वापस जा रही थी। सुनसान जंगल और दिन के ढलने के कारण हमने भी वापसी का रूख कर
लिया।
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| जंगल सफारी में झूला झूलते मित्र |
अब हमारा
अगला पड़ाव मानसून पैलेस था जो उदयपुर की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित था। यधपि यह काफी
ऊँचाई पर स्थित है लेकिन वहां तक पहुँचने के लिए सड़क बनी हुई है। अत: हमलोग अपनी
गाड़ी से यहां पहुँच गए। यहा से पूरा उदयपुर नगर देखा जा सकता है। यहां से शहर
देखने के बाद हमे भी विश्वास हो गया कि सचमुच यह झीलों की नगरी ही है। क्योंकि शहर
के किनारे और बीच में अनेक झील दिखाई दे रहे थे।
मानसून
पैलेस को यहां के राजा ने मानसून में बारिश के रोमांटिक स्वरूप को निहारने के लिए बनवाया
था। हमलोग जब यहाँ पहुंचे थे तो शाम के 3:00 बजे रहे थे,
धीरे-धीरे बादल जमा हो रहा था और लग रहा था कि हमे भी यहाँ कि बारिश में भीगने को
सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। हमलोग यहाँ से नगर को देख रहे थे, फिर
यहाँ बने महल की ओर गए, जिसके दूसरे छोर पर पर्यटक के बैठने के लिए बेंच लगी थी और कुछ
पर्यटक जमा थे।
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| मानसून पैलेस में मित्रों के साथ |
देखते-देखते
मौसम ने अंगड़ाई ली और तेज हवा के साथ हल्की बारिश (फुहारा) चलने लगा। तेज हवा और
बारिश से बचने के लिए अनेक पर्यटक महल के अंदर चले गए। लेकिन हम तो इस मौसम का
इंतजार कर रहे थे। अत: हम चारों खाली बेंच पर बैठकर मौसम के रूमानी अंदाज को महसूस
करने लगे। “ऊंची चोटी पर खड़ा होकर, तेज हवाओं के झोंकों के साथ पानी की
फुहार को जब आँख बंद कर महसूस किया जाता है तो एहसास होता है कि प्रकृति अपने अंदर
कितनी खूबसूरती, प्रेम और रोमांच को समेटे हुए है ”। लग रहा था कि बस ऐसे ही यहाँ
बैठे रहे। लेकिन समय का अपना महत्व होता है। अंधेरा होने से पहले हमे इस चोटी से
उतर जाना था। अत: दिल पर पत्थर रखकर भारी मन से वापस आना पड़ा।
नीचे
उतरते-उतरते अंधेरा होने लगा था लेकिन हमारे सारथी और गाईड मित्र विक्रम जी के मन
में अभी भी एक स्थान पर जाने की लालसा बची हुई थी। यह लालसा थी शाम को झील किनारे
दोस्तों के साथ मस्ती करने की। रास्ते में हमने कोल्ड-ड्रिंक्स और स्नैक्स खरीद
लिया और शहर से थोड़ी दूर पर स्थित झील के
किनारे पहुँच गए। यधपि अंधेरा हो रहा था लेकिन इस झील के किनारे लड़कों का झुंड एवं
प्रेमी जोड़े बैठे हुए थे। हमने भी एक किनारा पकड़ लिया और आपस में बात करने
लगे।
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| फतेह सागर झील का आनंद लेते हुए |
अंधेरा
जैसे-जैसे बढ़ रहा था वैसे-वैसे प्रेमी जोड़े अपने-अपने घरो को वापस जा रहे थे।
लेकिन अपनी धुन में मस्त हम “चार यार” रात गुलजार करने में लगे थे। रात का अंधेरा, झील की शीतलता, पहाड़ की
शांति, चिड़ियों
की चहचहाहट एक विचित्र शांति का एहसास करा रही थी। शहर से दूर अनजान झील के किनारे हम चार दोस्त एक अलग प्रकार के डर
और रोमांच का अनुभव कर रहे थे। खैर रात के 9:00 बजने वाले थे। अत: हमलोग वापस अपने
होटल की ओर चल पड़े। अंधेरा अधिक होने के कारण रास्ता भटकने का डर भी लग रहा था, फिर भी
यह विश्वास था कि अनजान रास्तों से घुममकड़ों का मित्रवत संबंध होता है और
कोई मित्र अपने मित्र को गलत रास्ता नहीं बताता। इस विश्वास ने सही रास्ता दिखाया
और हम सकुशल अपने होटल पहुँच गए। हमने रास्ते में ही खाना खा लिया था, थोड़ी थकान
भी हो गई थी। अत: हम जल्द ही सो गए।
दूसरे
दिन, हम जल्दी
उठे और तैयार हो गए। हमे होटल खाली कर अपना समान अपनी गाड़ी में रखना था क्योंकि
उदयपुर के कुछ स्थानों को देखकर हमे शाम तक माउंट-आबू जाना था। जहाँ हमलोग रात को
ठहरते। सामान पैक कर हमने अपनी गाड़ी में रख दिया और होटल वाले का बिल चुकाकर आज के
पहले पड़ाव की ओर चल दिए। एक बार फिर हमलोगों ने फतेह सागर झील का चक्कर लगाया और
नीमच माता मंदिर की ओर चल दिए।
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| नीमच माता |
नीमच
माता को उदयपुर की वैष्णो देवी कहा जाता है, मंदिर
एक पहाड़ी की चोटी पर है जहाँ ट्रेकिंग कर जाया जाता है। 1.5 Km की खड़ी
चढाई करने के बाद हमलोगो ने मंदिर के दर्शन किए। इस मंदिर में स्थानीय लोग मन्नत
मांगने आते है और मन्नत पूरा होने पर भंडारा का आयोजन करते है। मंदिर के पास अधिक भीड़
नहीं होने के कारण शांति थी। अत: हमलोग मंदिर के दूसरे छोर पर रखे बेंच को अपने
हिसाब से सेट कर बैठ गये, यहाँ आने वाली हवाएँ अपने साथ झील की ठंडक और पहाड़ी जंगल की खुशबू ला
रही थी जो दोपहरी की धूप में भी सुकून दे रहा था। कुछ देर यहां समय बिताने के बाद
हमलोग नीचे आ गए।
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| नीमच माता का मंदिर |
हम पुन:
फतेह सागर झील के पास पहुँच गये जिसके एक किनारे की पहाड़ी पर महाराणा प्रताप
म्यूजियम तथा एक विशाल मूर्ति लगी हुई है। टिकट कटा कर हमलोग प्रवेश
कर गए। सबसे पहले हमलोग महाराणा प्रताप की विशाल प्रतिमा को देखने गए। प्रतिमा
पहाड़ी की चोटी पर बना है जो महाराणा प्रताप के शौर्य को व्यक्त करता है। दोपहरी में
जब सूरज अपनी पूरी शक्ति से किरणे बिखेर रहा था। उस समय भी यह स्थान सुंदर लग रहा
था यहां भामाशाह एवं हाकिम खाँ सूरी की मूर्तियाँ भी बनाई गई है। इसके थोड़ा नीचे
झील की ओर कुछ स्थानो को इस तरह बनाया गया है कि आप झील की खूबसूरती का आनंद ले
सके।
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| महाराणा प्रताप स्मारक |
यहाँ से
नीचे उतरते समय एक प्राचीन किला का अवशेष भी देखने को मिला। अब हमलोग म्यूजियम के
पास पहुँच गए। गार्ड ने टिकट मांगा तो हमलोग अमित जी की ओर देखने लगे क्योंकि टिकट
उनके पास था, लेकिन यह क्या? अमित जी
के पास भी टिकट नहीं था। हम सारे दोस्त अपनी-अपनी पॉकेट देखने लगे लेकिन टिकट नहीं
मिला। शायद खो गया था ! अत: हमारे पास दो विकल्प थे कि टिकट पुन: खरीद कर लाया जाय
अथवा बिना देखे ही प्रस्थान किया जाय।
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| म्यूजियम के बाहर का फोटो |
विक्रम
जी ने तीसरा विकल्प चुना कि गार्ड को यह विश्वास दिलाया जाय कि हमने टिकट खरीद था
क्योंकि बिना टिकट के मुख्य द्वार से प्रवेश ही नहीं था। चूंकि हम चारों व्यक्ति
सरकारी सेवा मे थे अत: पहले गार्ड को फिर उनके अधिकारी को विश्वास दिलाने में सफल
रहे कि हमने टिकट खरीदा था। अत: मूजियम में प्रवेश मिल गया। “यहाँ महाराणा
प्रताप के हथियार (भाले, तलवार), पोशाक
के साथ चितौडगढ़, रणथमभौर, उदयपुर
के सिटी पैलेस की प्रतिकृति रखी हुई है,” जो बेहद
आकर्षक प्रतीत होता है। छोटा म्यूजियम होने के कारण जल्द ही पूरा म्यूजियम देख
लिया। अब हमे भूख लगने लगी थी।
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| कुम्भलगढ़ दुर्ग की प्रतिकृति |
खाने-पीने
के लिए उदयपुर का सुखाड़िया सर्किल है। यहाँ अनेक प्रकार के फास्ट फूड मिलते
है। हमने भी यहाँ के फास्ट-फूड का आनंद लिया फूड स्वादिष्ट था। फास्ट फूड की
दुकानों के साथ यहाँ अलग-अलग प्रकार के पानी –पूरी वालों का ठेला भी लगा था। अत:
हमने भी यहाँ के पानी-पूरी का स्वाद चख लिया। यहाँ से हमलोगों को माउंट आबु की ओर
प्रस्थान करना था। चूंकि घड़ी में समय 3:30 बजे दिखा रहा था। अत: बिना देरी किए
हमलोग प्रस्थान कर गए।
सफर जारी
है .............................
बहुत बहुत बढ़िया भाइजी
ReplyDeleteबस फ़ोटो पर नाम थोड़ा नीचे और साइड में लगाओ
Thanks Dr Sahab
ReplyDeleteحیرت انگیز
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